स्वतंत्र भारत को जिस मार्ग पर आगे बढ़ना था, वह आज़ादी के संघर्ष के दौरान ही निश्चित हुआ था आज़ादी की लड़ाई भारतीय जनता को प्रभुसत्ता संपन्न बनाने के उद्देश्य से लड़ी गई थी । यह लड़ाई एक ऐसा जनतंत्र स्थापित करने के लिए थी ,जिसमें सारी सत्ता समूची जनता के हाथों में रहनी थी ,ना कि किसी एक या दूसरे समूह के हाथों में ।
भारत में विभिन्न धर्मों को मानने वाले विभिन्न भाषाएँ बोलने वाले और विभिन्न रीति रिवाज़ों का अनुसरण करने वाले लोग थे ।यद्यपि देश में विभेद पैदा करने वाले सांप्रदायिक दलों जैसे तत्व मौजूद थे , परंतु आज़ादी के आंदोलन को किसी एक या दूसरे समुदाय का आंदोलन बनाने मैं उन्हे सफलता नहीं मिली । तथा यह एक प्रकार से ,राष्ट्रीय आंदोलन एक धर्म निरपेक्ष आंदोलन था ।
प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार दिया गया किसी भी धर्म को कोई विशेष स्थान नहीं दिया गया । धर्मनिरपेक्षता, प्रत्येक जनतंत्रिक आंदोलन का अभिन्न अंग होती है । जनतंत्र में सब नागरिक बराबर होते हैं ,अर्थात् सबके समान अधिकार होते हैं । राष्ट्रीय आंदोलन ने एक न्यायोचित समाज की स्थापना के लिए भारतीय समाज के पुनर्निर्माण का लक्ष्य भी अपने सामने रखा था । यह लक्ष्य समाजवादी विचारों के प्रसार के साथ अधिक स्पष्ट हो गया था ।
भारत ने शांति की नीति पर ज़ोर दिया क्योंकि शांति से रहने पर ही पुनर्निर्माण कार्य पूरा हो सकता है ,और विश्व बंधुत्व की भावना का विकास किया जा सकता है ।शांति की नीति इस विश्वास पर भी आधारित थी कि संसार के सभी आम लोगों के हितों में कोई विरोध नहीं है । इस तरह आज़ादी और शान्ति स्वतंत्र भारत की विदेश नीति का आधार बन गई ।इन सिद्धांतों से प्रेरित होकर भारत की जनता ने 1947 ईसा पूर्व में एक स्वतंत्र राष्ट्र की जीवन यात्रा आरंभ की ।