ऑक्सीजन ऋण:-
सक्रिय शारीरिक कार्य या व्यायाम के समय पेशियों में ऊर्जा का व्यय बहुत बढ़ जाता है और अधिकांश ATP, ADP में बदल जाती है। अतः ग्लूकोज का जारण तीव्र होने लगता है, परंतु फेफड़े इसके लिए आवश्यक ऑक्सीजन की पूर्ति नहीं कर पाते। अतः ग्लूकोज के अधूरे जारण से पेश तंतुओं में लैक्टिक अम्ल बनने लगता है और हमारी सांस फूल जाती है। इसी दशा को शरीर का ऑक्सीजन ऋण कहते हैं। व्यायाम की समाप्ति के काफी बाद तक हम जल्दी-जल्दी सांस लेकर ऋण को चुकता करते हैं, अर्थात वायु से अधिक ऑक्सीजन लेकर लैक्टिक अम्ल को फिर सेे जारण योग्य बनाते हैं और इस प्रकार ATP के असाधारण व्यय की पूर्तिि करते हैं। इसीलिए जिन व्यक्तियों मेंं ग्लूकोज की कमी रहती है वह अधिक मेहनत का काम नहीं कर पाते।
अंगघात या लकवा:-
यदि मस्तिष्क में उपस्थित पेशी- नियंत्रण केंद्र अथवा किसी से प्रेरणाएं ले जाने वाली चालक तंत्रिका अथवा पेशी से संबंधित पेशी तंत्रिकीय युग्मानुबन्ध की किसी कारणवश क्षति हो जाती है तो वह पेशी जंतु की इच्छा होने पर भी आंकुचन नहीं कर सकती । ऐसी पेशी को अशक्त (paralysed) कहते हैं। लकवे में पूरे पूरे अंगो की पेशियां अशक्त हो जाती हैं। विद्युत जैसी बाहरी शक्ति द्वारा प्रेरित करें तो ऐसी पेशियां पूर्ववत आकुंचन कर सकती हैं, परंतु लंबे समय तक अशक्त बनी रहे तो धीरे-धीरे पेशियों की कार्य क्षमता समाप्त हो जाती है।