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Pramod kumar
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जलियांवाला बाग नरसंहार
जलियाँवाला बाग नरसंहार
13 अप्रैल, 1919 को पंजाब के अमृतसर में जलियाँवाला बाग के मैदान में लोग एकत्रित हुए।
कुछ लोग सरकार के दमनकारी उपायों के विरोध में यहाँ आए थे, जबकि कुछ लोग बैसाखी मेले में भाग लेने आए थे।
यह मैदान शहर से दूर था, इसलिए वहाँ लागू हो चुके मार्शल लॉ की जानकारी लोगों को नहीं थी।
जनरल डायर ने उस क्षेत्र में प्रवेश किया और उस मैदान से बाहर निकलने के सभी रास्ते बंद करा दिए।
इसके पश्चात् उसने अपने सिपाहियों से भीड़ पर अंधाधुंध गोलियाँ चलाने को कहा।
इस घटना में सैकड़ों लोग मारे गए। जलियाँवाला बाग हत्याकांड की खबर फैलने के कारण लोग सड़कों पर प्रदर्शन करने लगे, हड़तालें होने लगीं तथा लोगों ने सरकारी भवनों पर हमला किया।
लोगों ने अंग्रेजों का डटकर सामना किया। सरकार सत्याग्रहियों को भयभीत करना चाहती थी, इसलिए उसने सत्याग्रहियों को जमीन पर अपनी नाक रगड़ने, सड़क पर घिसटकर चलने और सभी साहिबों को सलाम करने के लिए मजबूर किया।
लोगों को पीटा गया और गाँवों पर बमबारी हुई। रवींद्रनाथ टैगोर ने इस घटना के विरोध में अपनी ‘नाइटहुड' की उपाधि को वापस लौटा दिया।
महात्मा गाँधी ने अत्यधिक हिंसा फैलने के कारण इस आंदोलन को बंद कर दिया।
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