विकास ऐसा प्रश्न है जिस पर कभी भी कोई एकमत नहीं हो सकता सवाल है क्यों विकास को लेकर हमेशा दो राय बनी रहेगी और लगातार इस पर बहस भी होती रहेगी इसमें यह समझना मुश्किल होगा कि क्या वाकई विकास हो भी सकता है यही बात गरीब निचले तबके को विकास की योजनाओं से दूर रखती है जिसे समझने की जरूरत है। यह बात उन झुग्गी झोपड़ी वालों पर लागू होती है जिन्हें यह अन्य सेवाएं तो दूर जीवन की मौलिक जरूरतें भी नहीं मिल पा रही है जिसमें पानी Roti Kapda Aur Makaan शामिल है यही कारण है कि वह सरकार की योजनाओं के लाभों से बिल्कुल वंचित रहते हैं यही वजह है कि विकास का स्वरूप असंतुलित होता जा रहा है जो किसान अपने दैनिक जरूरतों को ₹500 में पूरा कर रहा था वही अब ₹200 में उसे काम चलाना पड़ा अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार से अपना हक लेना पड़ेगा । हमें जागरुक होने की जरूरत है क्योंकि इसी संदर्भ में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि जब सड़के सुनी होती हैं तो संसद आवारा हो जाती है।