ब्रिटिश प्रदेशों मैं राजे- रजवाड़ों के धीरे धीरे समाप्त हो जाने के कारण भारतीय उद्योगों की महत्वपूर्ण वस्तुओ की माँग घटती गई । राजा और सामंत कुशल कारीगरों को नियमित वेतन देते थे जबकि अंग्रेजों ने भारती शिल्पकारों को उस प्रकार का आश्रय प्रदान नहीं किया। भारत का भाग्य अब इंग्लैंड के व्यापारियों और उद्योगपतियों के हाथों में था ।यघापि भारत की अधिकांश कृषि उपज की देश मैं ही उपभोग होती थी परंतु दूसरे देशों में भी भारतीय वस्तुओं की माँग थी ।
सत्रहंवी सदी के अंत तक भारत के सूती कपड़ों की इंग्लैंड में इतनी अधिक माँग बढ़ गई कि वहाँ का कपड़ा उद्योग नष्ट हो गया था । परिणामता इंग्लैंड में पहले १७०० ई० मैं और पुनः १७२०ईसा पूर्व में क़ानून बनाकर भारतीय कपड़ों की कई किस्मों के आयात पर पाबंदी लगा दी गई। इन पाबंदियों का भारत के कपड़ा उद्योग पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा फिर भी सूती व रेशमी वस्त्रों और कुछ अन्य वस्तुओं का निर्यात व्यापार चलता रहा।
इस दौरान इंग्लैंड में कपड़ा उद्योग का विकास हो रहा था इस उद्योग ने भारतीय कपड़ों की किस्मों का मुक़ाबला करने की भरपूर कोशिश की उदाहरण के लिए लखनऊ में बनने वाली छींट को इंग्लैंड की महिलाए बहुत पसंद करती थी ।१७५४ ई० तक अंग्रेज़ रंगरेज दावा करने लगे की वे भारतीय दस्तकारों से बेहतर छफ़ाई कर सकते हैं ।औद्योगिक क्रांति और नई मशीनों ने इंग्लैंड के कपड़ा उघोग की मदद की । इससे भारतीय कपड़ों के निर्यात की स्थित बिगड़ गयी ।
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