भारतीय उद्योगों का पतन (२)

ब्रिटिश व्यापारियों और उत्पादको के  हितों की रक्षा के लिए भारत में और इंग्लैंड में कुछ क़दम उठाए गए इससे भारतीय उद्योगों को क्षति पहुची । कंपनी का मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए उसके एजेंटों ने कपड़ा और अन्य वस्तुओं के बाहर भी उत्पादकों को निवेश किया कि वे उनसे बाज़ार भाव से २० से 40%  तक कम क़ीमत ले । उस समय ढाका मलमल के उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र था उन्होंने क़ीमतें घटाने का विरोध किया और ऊँची क़ीमतों की माँग करने पर उनके विरुद्ध बलप्रयोग किया ।

कंपनी के अधिकारी कपास की क़ीमत को नियंत्रित करने लगे तो कपड़ा उत्पादों की कठनाएँ  और भी अधिक बढ़ गई बंगाल में अच्छे क़िस्म का कपास दक्कन से थोक में कपास ख़रीदते थे तथा उसे ऊँची क़ीमतों पर बंगाल के बुनकरों को भेज देते थे इन सब कारणों से बुनकर समुदाय आर्थिक रूप से निशकत हो गया ।और सूती कपड़ा उद्योग चौपट हो गया । मशीन से बने सस्ते सूती कपड़ों के आने से भारतीय कपड़ा उद्योग को सबसे बड़ा झटका लगा । 

इंग्लैंड से भारत आने वाली वस्तुओं पर चुंगी नहीं लगती थी दूसरी ओर भारत से इंग्लैंड पहुँचने वाली वस्तुओ पर  चुंगी लगती थी परिवहन और संचार के साधनों में हुए सुधारों से भारत को ब्रिटिश वस्तुओं का बाज़ार और ब्रिटिश उद्योगों के लिए कच्चे माल का स्रोत बनाने में आसानी हुई । भारत के विभिन्न भागों को बंदरगाह से जोड़ने वाली सड़कों का पुनर्निर्माण किया गया ।नदी परिवहन का भी विकास किया गया । लेकिन परिवहन के क्षेत्र मैं सबसे महत्वपूर्ण सुधार भारत मैं रेलवे की प्रारम्भ थी । भारत में पहली रेलवे १८५३ ईसा पूर्व में बम्बई और थाणे के बीच प्रारंभ हुई ।डाक व्यवस्था में सुधार हुआ । १८५३ ईसापूर्व से भारत में टेलीग्राफ की भी शुरूआत हुई ।

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