कांग्रेस ने सर्वप्रथम 1920 ई. के नागपुर अधिवेशन में देशी रियासत के प्रति अपनी नीति घोषित की। इस अधिवेशन में एक प्रस्ताव पारित कर रियासतों के शासक से तुरंत उत्तरदाई सरकार के गठन की मांग की । इसी अधिवेशन में कांग्रेस ने देशी रियासतों की जनता को कांग्रेस सदस्य बनने की अनुमति दी परन्तु रियासत के अंदर कांग्रेस के नाम पर आंदोलन चलाने की अनुमति नहीं दी।
अपने 1927 के नागपुर के संकल्प को ही दोहराया परन्तु 1929 ई. के लाहौर अधिवेशन में घोषणा भी की कि देशी रियासत भी शेष भारत से पृथक नहीं है कांग्रेस ने 1938 ई. के हरिपुरा अधिवेशन में पहली बार घोषित किया कि पूर्ण स्वराज के अन्तर्गत रजवाड़े तथा ब्रिटिश भारत दोनों आते हैं। इसी बात को आगे बढ़ाते हुए 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में देशी रियासत में भी कांग्रेस कांग्रेस कार्यकर्ताओं को आंदोलन चलाने की अनुमति दे दी। 1939 में ही लुधियाना स्टेट पीपुल्स कांफ्रेंस के अध्यक्ष के रूप में जवाहर लाल नेहरू का चुनाव किया गया।
गांधी जी ने देशी रजवाड़ों में फैलते जन आंदोलन को नेतृत्व देने का निश्चय 1939 में लिया। इस साल इन्होंने पहली बार अपने निकट सहयोगी तथा व्यापारी जमनालाल बजाज को जयपुर में एक सत्याग्रह करने की अनुमति दी तथा स्वयं वल्लभ भाई पटेल के साथ राजकोट रियासत में चल रहे आंदोलन को व्यक्तिगत तौर पर उपस्थित होकर हस्तक्षेप किया।