1937 में हुए चुनावों के परिणामों से मुस्लिम लीग और विशेषकर जिन्ना को काफी निराशा हुई। मुस्लिम लीग किसी भी प्रांत में बहुमत प्राप्त नहीं कर पाई। यहां तक की मुस्लिम - बहुलता वाले प्रांत बंगाल और पंजाब में भी इसे बहुमत नहीं मिल सका। 1928 से ही जिन्ना ने कांग्रेस के साथ सहयोग करना बंद कर दिया और लंदन आकर 1932 में वकालत शुरू कर दी। 1935 में वापस लौटने के बाद मुख्यत चुनावी परिणामों को देखते हुए जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग कांग्रेस की घोर विरोध हो गई। उसने प्रचार शुरू कर दिया कि मुस्लिम अल्पसंख्यकों के बहुसंख्यक हिन्दुओं में समा जाने का खतरा है। एक ओर कांग्रेस ने मूलगामी कृषि कार्यक्रम अपना लिया था, दूसरी ओर जगह जगह पर कृषक आंदोलन शुरू हो रहे थे। इस कारण जमींदार और सूदखोर अपने हितों की रक्षा के लिए सांप्रदायिक पार्टियों को अपना समर्थन देने लगे। 1940 में मुस्लिम लीग ने एक प्रस्ताव पारित करके मांग की कि स्वाधीनता के बाद देश के दो भाग कर दिए जाएं।
1940 के पाकिस्तान प्रस्ताव की मसविदा सिकंदर हयात खान ने तैयार किया था। फजलुल हक ने कुछ संशोधन के साथ इसे प्रस्तुत किया था तथा खालिकुज्जमा ने इसे स्वीकार कराया था।