महात्मा बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था जिसका अर्थ है वह जो अपने लक्ष्य को प्राप्त करता है।
इनका जन्म शाक्य कुल ( आधुनिक नेपाल क्षेत्र)में हुआ था जब इनकी माता अपने पति के यहां से अपने पिता के यहां जा रही थी वहीं जाते समय रास्ते में लुंबिनी मार्ग में साल के पेड़ के नीचे ये जन्म लिए।
इनकी माता माया देवी कोलिया की राजकुमारी था
ब्राह्मण कोड़ान्ना ने भविष्यवाणी किया था कि ये बुद्ध बनेंगे
जन्म के 7 वे दिन ही इनकी माता माया देवी का देहांत हो गया अतः इनका पालन पोषण इनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया
इनके घोड़े का नाम कांथक था
राज्य में घूमते समय इन्होंने चार दृश्य देखा - एक बूढ़ा आदमी,बीमार आदमी,मृत आदमी और एक साधु
महाभिनिष्क्रमण के बाद सबसे पहले ये अनुपिय नामक आम के बगीचे में पहुंचे
वैशाली के पास सांख्य दर्शन के दार्शनिक आलार कलाम को गुरु बनाया और उनसे सिक्षा लिया उसके बाद आगे बढ़कर राजगृह धर्माचार्य रुद्रक राम पुत्र को गुरु बनाया।
दोनों ही इनके सवालों के सही जवाब नहीं दे सके अतः इन्होंने 6 वर्ष की कठिन तपस्या की तथा बुधवार के दिन वैशाख के पूर्ण चंद्र दिन ( अप्रैल - मई) में निरंजना नदी आधुनिक फलूह नदी के किनारे इन्हे ज्ञान प्राप्त हुआ
इसके बाद सबसे पहले सपुत्त तथा बलिक इनके पास ज्ञान प्राप्त करने पहुंचे तथा बुद्ध ने इन्हे 4 आर्य सत्य बताया। ध्यान देने योग्य बात यह है कि ये दोनों इनके शिष्य नहीं बने
इनके पहले शिष्य कोंडम्मा असाजी भद्दिय वाप्पा तथा महानाम थे
इन्हे ही इन्होंने अष्टांग मार्ग बताया
बुद्ध ने अपना प्रथम वर्षा काल सारनाथ में बिताया।
शिष्य आनंद के कहने पर इन्होंने महिलाओं को भी बौद्ध संघ में प्रवेश की अनुमति दी।
बुद्ध ने सबसे ज्यादा उपदेश श्रावस्ती में दिए।
भगवान बुद्ध को सुकर मादाव ( मशरूम) की सब्जी अत्यंत प्रिय थी।
बुद्ध ने अंतिम उपदेश सुभद्द को दिया।
निर्वाण के पश्चात बुद्ध तुषित नामक स्वर्ग में गए।