Day- 73
- मूल अधिकारों का प्रायोजन राज्य पर बंधन लगाकर मर्यादित शासन स्थापित करना है। इसे ‘विधि सम्मत शासन’ कहते हैं, जो मनुष्य के शासन से भिन्न है।
- ‘बशेशरनाथ बनाम आयकर आयुक्त, ए.आइ.आर. 1959 सु.को 149 के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया है कि संविधान में मूल अधिकार रखने का प्रयोजन केवल व्यक्तियों को लाभ पहुँचाना नही था। यह अधिकार एक नीति के परिणामस्वरुप है। इसलिए ‘अधित्यजन का सिध्दान्त’, ‘विबन्ध का सिध्दान्त’ और ऐसे ही अन्य सिध्दान्त मूल अधिकारों को लागु नहीं होते। राज्य किसी व्यक्ति के मूल अधिकार को इस आधार पर भंग नही कर सकता कि किसी व्यक्ति ने उसका अधित्यजन कर दिया था।
- भारतीय संविधान में मूल अधिकारों को 6 शीर्षो में विभाजित किया गया है –
- समता का अधिकार (अनुच्छेद 14 – 18)
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19 - 22)
- शोषण के विरुध्द अधिकार (अनुच्छेद 23 – 24)
- धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25 – 28)
- संस्कृति एवं शिक्षा सम्बन्धी अधिकार (अनुच्छेद 29 – 30)
- संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
केवल नागरिकों को उपलब्ध मूल अधिकार
- कुछ मूल अधिकार केवल नागरिकों को ही उपलब्ध हैं।
- अनुच्छेद 15 – धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध।
- अनुच्छेद 16 – लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता।
- अनुच्छेद 19 – वाक-स्वातंत्रय, सम्मेलन, संगम, संचरण, निवास और वृत्ति की स्वतंत्रता।
- अनुच्छेद 29 और 30 – अल्पसंख्यकों के संस्कृति और शिक्षा सम्बन्धी अधिकार।
मिलते है हम अगले दिन, नये अधिकार या मौलिक अधिकार विषय पर फिर आगे चर्चा करने के..