भारतीय संविधान Easy Notes - 75 (मूल अधिकार या मौलिक अधिकार)

Day- 75

  • पृथक्करण के सिद्धांत के अनुसार संविधान पूर्व निर्मित विधि के यदि कुछ प्रावधान संविधान के प्रावधानों से असंगत हैं तो इससे संपूर्ण विधि शून्य नहीं होगी अपितु केवल वह ही उपबंध शून्य माने जाएंगे जो असंगत है तथा शेष उपबंध  यथावत  प्रभावशील बने रहेंगे।  लेकिन शर्त यह है कि  ऐसे असंगत प्रावधान  शेष प्रावधानों को  प्रभावित किए बिना  आसानी से  पृथक किए जा सकते हो यदि ऐसे प्रावधान एक-दूसरे से इतने मिले-जुले हैं की उन्हें एक-दूसरे को प्रभावित किए बिना आसानी से पृथक नहीं किया जा सकता है  तो उस संपूर्ण विधि का प्रभाव  अवैध विधि-सा होगा।
  • कुंज बिहारी लाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया ए आई आर 1963 सुप्रीम कोर्ट 318’ के मामले में यह निर्णीत किया गया कि मूल अधिकारों से संबंधित संवैधानिक प्रावधानों का प्रभाव भूतलक्षी नहीं है। अर्थात यह प्रावधान उसी दिन से लागू माने गए हैं जिस दिन से संविधान लागू हुआ इसका स्पष्ट अभिप्राय है कि संविधान के लागू होने के पूर्व जो विधियां बन चुकी हैं वह संविधान के लागू होते ही आरंभ से अवैध नहीं मान ली जाएंगी। यदि वे संविधान के प्रावधानों से असंगत है तो संविधान के लागू होने के समय से उनका कोई प्रभाव नहीं रह जाएगा। लेकिन ऐसी विधियों के अधीन कोई कार्य किया जा चुका है तो उस पर वही विधि लागू होगी ना कि संविधान के प्रावधान।
  • संविधान के लागू होने के पूर्व निर्मित विधियां उस सीमा तक अवैध होती हैं जिस सीमा तक वे मूल अधिकारों से असंगत है। ऐसी विधियां आरंभ से ही शून्य अथवा अवैध नहीं होती अर्थात ऐसी विधियां मृतप्राय नहीं हो जाती हैं अपितु वह मूल अधिकारों द्वारा अच्छादित हो जाती है और सुषुप्त अवस्था में रहती हैं। भविष्य में कभी भी संशोधन द्वारा यह आच्छादन हट सकता है और वह पुनर्जीवित हो सकती हैं। इसे आच्छादन का सिद्धांत कहा जाता है।
  • अनुच्छेद 13 के खंड (2) में संविधान के लागू होने के बाद निर्मित विधियों के प्रभाव के बारे में उपबंध है। किसके अनुसार संविधान के लागू होने के पश्चात राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बना सकती है जो –
  1. मूल अधिकारों को छीनती हो, या
  2. मूल अधिकारों को कम करती हो, या
  3. मूल अधिकारों से असंगत हो।
  • अनुच्छेद 13 का उपखंड (1) संविधान पूर्व निर्मित विधियों के बारे में तथा अनुच्छेद 13 का उपखंड (2) संविधानोत्तर विधियों के बारे में उपबंध करता है।
  • अनुच्छेद 13(3)(क) मैं ‘विधि’ की परिभाषा की गई है। यह परिभाषा बहुत व्यापक है इस परिभाषा के अंतर्गत विधि का बल रखने वाला कोई अध्यादेश, आदेश, उपविधि, नियम, विनियम, अधिसूचना रूढ़ि या प्रथा है। स्मरणीय रहे कि इस परिभाषा में विधान मंडल द्वारा अधिनियमित विधि नहीं आती है। इसका कारण यह है कि अधिनियमित विधि विधि का ऐसा सर्वमान्य उदाहरण है जो सर्वाधिक स्पष्ट है। इसलिए उसे परिभाषा में रखने की आवश्यकता नहीं समझी गई।

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