नवम्बर 1926 ई० का चुनाव

नवम्बर 1926 के इस चुनाव में स्वराज्य वादियों का प्रदर्शन काफी खराब रहा। केंद्र में इसे 40 सीटों पर और मद्रास में आधी सीटों पर विजय मिली, लेकिन बाकी प्रांतों, विशेषकर संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत और पंजाब में इसे भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। सांप्रदायिक हिन्दू और मुस्लिम ताकतों का विधान मंडलों में प्रतिनिधत्व बढ़ गया। स्वराज इस बार  विधान मंडलों में राष्ट्रीय मोर्चा बनाने में असफल रहे। चुनाव में खराब प्रदर्शन के कारण निम्नलिखित हैं-

1- 1925 के चुनाव में चितरंजन दास की मृत्यु हो गई, जिससे संगठन के नेतृत्व पर बुरा प्रभाव पड़ा।

2- 1923 के चुनाव में जिन्हें टिकट मिला था, 1926 के चुनाव में उन्हें टिकट नहीं दिया गया , तो उन्होंने स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव में भागीदारी की । जनता में तब उनके सत्तालोलूप  होने का संदेश गया।

3- पार्टी के भीतर सांप्रदायिक ताकतों का मजबूत होना ।

4- स्वराज्य पार्टी के सदस्यों के द्वारा विभिन्न राजकीय पदों को स्वीकार के लेना, जबकि चुनाव के घोषणा पत्र में यह बात बिल्कुल स्पष्ट कर दी गई थी कि स्वराज्य वादी किसी भी प्रकार के लाभ के पद को धारण नहीं करेंगे ।

जैसे :-  1925 में बिट्ठल भाई पटेल के द्वारा केंद्रीय  विधान सभा के अध्यक्ष पद को स्वीकार कर लिया उललेखनीय है कि इस पद को सुशोभित करने वाले वे प्रथम भारतीय थे ।

इसी प्रकार मध्य प्रांत में कौंसिल में स्वराज्य पार्टी के नेता एस.बी. तांबे ने गवर्नर की कार्यकारिणी परिषद में मंत्री पद को स्वीकार कर लिया।

परंतु , अपनी असफलता के बावजूद भी स्वराज्य वादियों ने आंदोलन के पड़ाव वर्ष में आंदोलन के सर्वथा नवीन तरीको को जन्म देकर भारत में राष्ट्रीयता की भावनाओ को बनाए रखा और यही इसकी मुख्य उपलब्धि रही।

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