सर्वोच्च न्यायालय

 न्यायाधीशों की संख्या

  •   अनुच्छेद 124 (1) के अनुसार   '' भारत का एक सर्वोच्च न्यायालय होगा जो भारत के मुख्य न्यायमूर्ति और जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या  विहित नहीं करती है, है तब तक 7 से अनधिक अन्य्य न्यायाधीशों मिलकर बनेगा। संसद को यह संख्या कम करनेे का अधिकार नहीं है किंतु बढ़ानेे का  है और अभी तक संसद ने 5 बार यह संख्या बढ़ाई है। वर्तमान में '' सर्वोच्च न्यायालय संशोधन अधिनियम, 2008'' के बाद सर्वोच्च न्यायालय में मुख्य न्यायमूर्ति सहित अधिकतम 31 न्यायधीश हो सकते है। 

 न्यायाधीशों की नियुक्ति

  •   अनुच्छेद 124 (2) केे अनुसार सर्वोच्च न्यायालय केेे और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श् करनेे के बाद, जिनसे राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए परामर्श  करना आवश्यक समझेे, राष्ट्रपति अपनेे हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्चतम न्यायालय के प्रत्येक न्यायधीश को नियुक्त् करेगा और वह न्यायधीश तब तक पद धारण करेगााा जब तक 65 वर्ष की आयु प्राप्त्त नहीं कर लेता  है । लेकिन मुख्य् न्यायमूर्ति् से भिन्न  किसी न्यायधीश की नियुक्ति की दशा में भारत के मुख्य् न्यायमूर्ति सदैव परामर्श कियाा जाएगा
  • इस अनुच्छेद में सबसे महत्वपूर्ण शब्द 'परामर्श' (Consultation) है। सर्वोच्च न्यायालय ने विभिन्न मामलों में इसका अलग -अलग अर्थ निर्धारित किया है। 'परामर्श' शब्द को लेकर दो मूल प्रश्न थे --1:-परामर्श राष्ट्रपति पर आबध्दकारी  (Binding) है या नहीं; और 2:- परामर्श कितने और किन न्यायाधीशों से किया जाना चाहिए? सर्वोच्च न्यायालय ने 1982, 1993 तथा 1998 में विभिन्न मामलों में इस अनुच्छेद की विस्तृत व्याख्या की।
  • वर्तमान में इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती है यह सिद्धांत निम्नलिखित है:-
  1. अनुच्छेद 124 (2) में वर्णित 'परामर्श' (Consultation) का तात्पर्य सिर्फ 'एक व्यक्ति' के परामर्श से नहीं बल्कि 'अनेक न्यायाधीशों' (Plurality of Judges)के परामर्श से है।
  2. मुख्य न्यायमूर्ति को सर्वोच्च न्यायालय के 4 वरिष्ठतम न्यायाधीशों के मंडल से परामर्श करके ही राष्ट्रपति के पास सिफारिश भेजनी चाहिए। न्यायाधीशों के इस मंडल में भावी मुख्य न्यायमूर्ति भी अनिवार्यत: शामिल होना चाहिए।
  3. न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए इस मंडल मैं 'आम सहमति' होनी चाहिए, निर्णय सिर्फ 'बहुमत' से नहीं होना चाहिए। मुख्य न्यायमूर्ति की राय का महत्व शेष न्यायाधीशों की राय के बराबर ही होगा, उससे ज्यादा नहीं। यदि 5 में से 2 न्यायधीश भी किसी व्यक्ति की नियुक्ति का विरोध करेंगे तो उसके नाम की सिफारिश राष्ट्रपति को नहीं भेजी जाएगी।
  4. परामर्श मंडल में सभी न्यायाधीशों की सलाह लिखित होनी चाहिए, मौखिक नहीं। मुख्य न्यायमूर्ति को अपनी शिफारिश के साथ-साथ अन्य न्यायाधीशों की लिखित सिफारिशें भी सरकार को भेजनी होगी। 
  5. सामान्यत: सरकार इस मंडल की सिफारिशें मानने को बाध्य है, किंतु यदि परामर्श संबंधी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है तो सरकार सिफारिशें मानने को बाध्य नहीं होगी।
  6. यदि सरकार सिफारिश किए गए किसी व्यक्ति को न्यायाधीश नहीं नियुक्त किए जाने के संबंध में मुख्य न्यायमूर्ति के पास कोई सूचना,  तथ्य या सामग्री भेजती है तो उस पर कार्यवाही करने के लिए भी मुख्य न्यायमूर्ति को परामर्श मंडल से विचार विमर्श करना होगा। 
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