स्वदेशी आंदोलन का सामाजिक आधार

स्वदेशी आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसने पहली बार भारत  जनता को राजनीति के आधुनिक तौर - तरीको से परिचित कराया। इस आंदोलन में पहली बार महिलाओं ने घर से बाहर कदम रखा और विदेशी चूड़ियां पहनने से इंकार कर दिया ।साथ ही विदेशी बर्तनों का इस्तेमाल करना बंद कर दिया ।इसी प्रकार , भारतीय युवाओं के एक बड़े वर्ग ने इस आंदोलन में शिरकत की। छात्रों ने पूरे जोश खरोश के साथ इस आंदोलन में स्कूलों एवं कालेजों का बहिष्कार कर भाग लिया। मजदूर वर्ग की आर्थिक कठिनाइयों को राजनीतिक स्तर पर पहली बार इसी आंदोलन के दौरान उठाया गया। धोबियो ने भी अपनी भागीदारी को प्रदर्शित करते हुए, विदेशी वस्त्रों को धोने से इंकार कर दिया ।कुछ जमीदारो ने भी इस आंदोलन में भाग लिया था, परंतु जहा तक मुसलमानों का सवाल है, तो इसमें बहुसंख्यक मुसलमानों ने भाग नहीं लिया था ।

 इस आंदोलन की एक बात के लिए आलोचना कुछ विद्वानों के द्वारा  की जाती है कि इसमें किसानों की भागीदारी ज्यादा नहीं रही । इसका एकमात्र अपवाद वारी साल सम्मेलन था , जिसमें कुछ किसानों ने भाग लिया था । इस सन्दर्भ में इतनी  बात कही जा सकती है कि एक ऐसा आंदोलन जो कि राष्ट्रीय स्तर का पहला आंदोलन था, उससे यह उम्मीद करना कि वह देश की सारी जनता को अपने में शामिल कर ले, गलत होगा।

स्वदेशी आंदोलन की विशेषताएं :-

1- पहला आंदोलन था, जो वास्तव में जनांदोलन था ।

2- संघर्ष के ऐसे तरीको का प्रयोग किया गया , जो बाद के राष्ट्रीय आंदोलन का आधार बना ,

जैसे:- हड़ताल, जुलूस, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा इत्यादि।

3- इस आंदोलन का दायरा काफी बड़ा था , राजनीति के साथ साथ कला, साहित्य,विज्ञान, शिक्षा, उद्योग आदि पर भी इसका प्रभाव पड़ा।

4- स्वावलंबन की भावना का प्रसार हुआ और आत्मनिर्भरता एवं आत्मशक्ति का नारा दिया गया।

स्वदेशी आंदोलन की असफलता के कारण:-

1- आंदोलन का एकाएक नेतृत्व विहीन हो जाना।

2- ब्रिटिश सरकार द्वारा निर्ममता पूर्वक दमन ।

3- प्रभावी संगठन का अभाव।

4- नरमपंथी एवं गरमपंथी का आपसी मतभेद।

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