1- स्वदेशी आंदोलन के स्वरूप एवं प्रसार क्षेत्र को लेकर कांग्रेस के भीतर तीव्र मतभेद उत्पन्न हो गए और 1907 के सूरत अधिवेशन में कांग्रेस का विभाजन नरमपंथी और गरमपंथी जैसे दो दलों में गया ।
2- आंदोलन के एकाएक नेतृत्व विहीन होने और उसका दमन कर दिए जाने की वजह से इसमें शामिल युवा भारतीयों में भयंकर असंतोष उत्पन्न हुआ और तब उन्होंने उस समय के बदनाम ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या करने की राजनीति प्रारम्भ कर दी। इस प्रकार क्रांतिकारी आंदोलन के प्रथम चरण की शुरुआत हुई।
उललेखनीय है कि तिलक को छह वर्ष की कैद की सजा देकर बर्मा के मांडले जेल में भेज दिया गया। वहा पर उन्होंने कैदी जीवन के रूप में मराठी भाषा के अपने एक प्रसिद्ध ग्रंथ ' गीता रहस्य ' की रचना कर डाली। तिलक ने अपने जीवन में दो और प्रसिद्ध ग्रंथ की रचना की थी- ' दि आर्कटिक होम ऑफ दि वेदाज ' तथा ' औरायन ' । लाला लाजपतराय अमेरिक चले गए। बिपिन चंद्रपाल ने अस्थाई रूप से राजनीति से सन्यास ले लिए , जबकि अलीपुर षड्यंत्र केस से रिहा कर दिए जाने के बाद अरविंद घोष राजनीति से सन्यास लेकर दक्षिण भारत में एक फ्रांसीसी बस्ती पांडिचेरी चले गए। वहीं पर औरो विले आश्रम की स्थापना की गई और वे एक महान दार्शनिक बन गए।
3- स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव शिक्षा पर भी पड़ा ।15 अगस्त 1906 को राष्ट्रीय शिक्षा परिषद् की स्थापना की गई जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय नियंत्रण के तहत ऐसी शिक्षा प्रदान करना था, जिससे भारत में राष्ट्र निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सके। टैगोर के शांति निकेतन के तर्ज ' बंगाल नेशनल कालेज ' की स्थापना की गई, जिसके प्रथम प्रधानाचार्य अरविंद घोष थे । इस दौरान अनेक राष्ट्रीय विद्यालयों की स्थापना की गई ,बंगाल में राष्ट्रीय शिक्षा फैलाने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका 1902 में सतीश चन्द्र मुखर्जी द्वारा स्थापित विद्यार्थियों के एक संगठन ' डान सोसाइटी ' ने अदा किया इसके प्रमुख सदस्यों में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुछ श्रेष्ठ विद्यार्थी शामिल थे । इसका उद्देश्य विश्वविद्यालय की शिक्षा की कमियों को पूरा करना एवं विशिष्ट जनो में उच्च संस्कार को विकसित करना था ।