मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को अपना महत्वपूर्ण स्मरण पत्र वायसराय के कार्यकारिणी परिषद के सामने रखा। इसमें कहा गया कि कम्पनी की सरकार यूरोपीय साहित्य को अंग्रेजी भाषा के माध्यम से बढ़ावा देगी और सभी धनराशियां इसी निम्मित खर्च की जाएगी।
अंग्रेजी शिक्षा के पक्ष में अपना निर्णय लिखने के पश्चात मैकाले ने बड़े गर्वपूर्वक अपने पिता को एक पत्र लिखा था-" मुझे पक्का विश्वास है कि यदि शिक्षा की हमारी योजना को आगे बढ़ाया गया , तो 30 वर्ष बाद बंगाल के संभ्रांत वर्गो में एक भी मूर्तिपूजक शेष नहीं रहेगा। यह परिणाम बिना किसी धर्मांतरण के और बिना उसकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप किए ही निकल सकेगा।"
ब्रिटिश प्रशासन में भारतीयों को उच्च पदों पर नियुक्ति करने और इसके लिए अंग्रेजी शिक्षा का प्रसार करने के पक्ष धरो में लॉर्ड विलियम बैंटिक सबसे आगे रहे अतः उन्होंने यह माना कि मैकाले का स्मरण पत्र बिल्कुल सम्योचित है उन्होंने उनके इस प्रसिद्ध स्मरण पत्र को 7 मार्च 1835 के एक प्रस्ताव द्वारा स्वीकार लिया और सरकार की शिक्षा नीति की स्पष्ट घोषणा करके वर्षों से चले आ रहे आंग्ल प्राच्य्य विवाद को समाप्त कर दिया।