मांटेग्यू घोषणा ( 20 अगस्त 1917)

भारत सचिव  मांटेगयू ने इस घोषणा में कहा है- " ब्रिटिश सरकार की यह नीति है ।कि भारतीय प्रशासन में भारतीय जनता को भागीदार बनाया जाये और स्थानीय संस्थाओं का क्रमिक रूप से विकास किया जाए।"

         इस घोषणा को स्वीकार करने और न करने को लेकर कांग्रेस के अंदर एक बार फिर से मतभेद प्रारम्भ हो गया । नरमपंथी जहा इसे स्वीकार करना चाहते थे , वहीं गरामपंथियों ने उसे अपर्याप्त बतलाया । नरमपंथी ने तब 1918 में सुरेन्द्र नाथ बनर्जी की अध्यक्षता में अपने को कांग्रेस   से अलग कर एक संस्था ' भारतीय उदारवादी संघ ' की स्थापना की । इस प्रकार यह कांग्रेस का दूसरा विभाजन था 1907 के सूरत कांग्रेस अधिवेशन में हुए प्रथम विभाजन में गरमपंथी कांग्रेस से अलग हट गए थे और वे नेशनलिस्ट कहलाए । परंतु नरमपंथी भी कांग्रेस से अलग हट गए थे ।

      इसी घोषणा के आधार पर भारत सचिव मांतेग्यू  ने तत्कालीन भारत के वायसराय  लॉर्ड चेम्सफोर्ड से मिलकर  1918 में एक रिपोर्ट तैयार की , जिसे मांटग्यु चेम्सफोर्ड रिपोर्ट या  मोंटफॉर्ड रिपोर्ट कहा गया। इसी रिपोर्ट के आधार पर 1919 में एक भारत सरकार अधिनियम पारित किया गया, जिसे मांटीग्यू चेम्सफोर्ड सुधार अधिनियम  कहकर पुकारा गया इस अधिनियम के अन्तर्गत प्रांतों में दवैध शासन की स्थापना और केंद्र में द्विसदनीय विधायिका की स्थापना किए जाने की घोषणा की गई ।

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