भारतीय राजाओं के प्रति ब्रिटिश नीति क्या है ? (भाग - २)

  • भारतीय राज्यों को प्रभुसत्ता के सिद्धान्त के अंतरगत ब्रिटिश सरकार के अधीन बनाया गया था। भारत में ब्रिटिश सत्ता सर्वोच्च थी।  भारत में ब्रिटिश प्रभुसत्ता १८७६ ई० के एक एक्ट में स्पष्ट रूप से व्यक्त की गई थी।  एक जनवरी,१८७७ ईसा पूर्व को महारानी विक्टोरिया ने भारत की समरगिनी की पदवी धरण की थी।
  • जिस समय भारत के कई क्षेत्रों में भयंकर अकाल पड़ा ,उस समय राज दरबार (इंपीरियल फ्रेंडली) का आयोजन किया गया।  दरबार में शामिल हुए राजाओं ने अपने वैभव का अत्यधिक प्रदर्शन किया । उसी राज दरबार में महारानी विक्टोरिया द्वारा भारत की साम्राज्ञी की पदवी धरण करने की घोषणा की गई।
  •  भारत में ब्रिटिश सरकार की प्रभुसत्ता  क़ायम हो जाने पर भारतीय  राजाओं की शक्ति और प्रभतवत्ता  घट गई।  भारतीय राज्यों को भीतरी और बाहरी संकटो से बचने की ज़िम्मेदारी अब ब्रिटिश सरकार की थी ।
  •  ब्रिटिश सरकार को भारतीय राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तचेप  करने के अधीन अधिकार मिल गए । राज्य के उत्तराधिकार के प्रत्येक मामले में ब्रिटिश राजसत्ता या भारत मैं उसके प्रतिनिधि  वायसराय की अनुमति प्राप्त करना आवश्यक हो गया ।
  •  उत्तराधिकार से संबंधित विवादों का निपटारा ब्रिटिश सरकार करती थी ।भारतीय राज्यों की कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा नहीं थी। वे अन्य देशों के साथ संबंध स्थापित नहीं कर सकते थे।
  • गवर्नर जनरल कर्जन ने भारतीय राजाओं को बिना अनुमति के विदेश जाने पर भी रोक लगा दी थी। ब्रिटिश सरकार ने भारतीय राजाओ द्वारा रखे जाने वाले सैनिकों की संख्या भी निश्चित कर दी थी। राज्यों की ये सेनायें  अंग्रेज़ अधिकारियों के नियंत्रण में थी ।
  • इन राज्यों के लोग  यदि किसी अन्य देश की यात्रा करते या वहाँ निवास करते तो , उन्हें ब्रिटिश साम्राज्य की प्रजा माना जाता था ।
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