कोशिका की संरचना
सन 1932 में जर्मनी के 2 वैज्ञानिकों नोल (Knoll) व रस्का (Ruska) मैं एक ऐसे सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार किया जिसमें वस्तु एक लाख (100000) गुना बढ़ी दिखाई पड़ती है। इसे इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी कहते हैं। कोशिकाओं का विस्तृत अध्ययन इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा किया गया। चित्र में कोशिका ( जंतु तथा पादप ) की संरचना दिखाई गई है।

इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी द्वारा दिखने वाले अवयव निम्न प्रकार हैं :
A. कोशिका कला या प्लाज्मा झिल्ली (Plasma membrane)
कोशिका के सभी अवयवों एक पतली झिल्ली द्वारा घिरे रहते हैं| इस झिल्ली को को कोशिका कला या प्लाज्मा झिल्ली कहते हैं। इस झिल्ली के द्वारा ही कोशिका अपने बाहरी वातावरण से अलग बनी रहती है।
यह झिल्ली एक प्रकार से दरबान का भी कार्य करती है। यह केवल निश्चित वांछित पदार्थों को ही अंदर आने देती है और अवांछित पदार्थों को या उन पदार्थों को जिन्हें बाहर भेजना आवश्यक होता है, को बाहर जाने देती है। इस प्रकार झिल्ली के आर-पार पदार्थों की गम्यता (आना-जाना) का चयन यह झिल्ली ही करती है। कोशिका कला के इस गुण को चयनात्मक पारगम्यता (Selective permeability) कहते हैं|
पौधों की कोशिकाओं में कोशिका कला के चारों ओर एक और पर्त होती है जिसे कोशिका भित्ति (Cell wall) कहते हैं य सेलुलोज़ (Cellulose) नामक पदार्थ की बनी होती है| या काफी दृढ़ होती है कोशिका की निश्चित आकृति व आकार बनाए रखने में सहायक होती है। कोशिका भित्ति कोशिका को केवल यांत्रिक हानियों और संक्रमण से ही रक्षा नहीं करती है, बल्कि यह कोशिकाओं के बीच आपसी संपर्क बनाए रखने तथा अवांछनीय वृहद अणुओं के लिए अवरोध प्रदान करती है।
B. केंद्रक (Nucleus)
कोशिका के मध्य में एक रचना होती है जिसे केंद्रक कहते हैं। यह कोशिका का सबसे प्रमुख अंग होता है क्योंकि यह एक तरह से कोशिका के प्रबंधक (Manager) के रूप में कार्य करता है। यह दोहरी झिल्ली के आवरण द्वारा चारों ओर से घिरा रहता है। जिसे केंद्रक आवरण (Nuclear envelope) कहते हैं। इसी के द्वारा केंद्रक शेष कोशिकाओं से अलग रह पाता है|
केंद्रक के अंदर एक पारदर्शी तरल पदार्थ भरा रहता है जिसे केंद्रक-द्रव्य (Nucleoplasm) कहते हैं| उचित रंजकों (Stains) से रंगने पर केंद्रक-द्रव्य में धागेनुमा पदार्थ जाल (Net) के रूप में बिखरा दिखाई पड़ता है| इसे क्रोमैटिन इन कहते हैं। यह क्रोमैटिन इन वास्तव में दो पदार्थों - प्रोटीन व डी. एन. ए. के अणुओं में संयुक्त होने से बनता है। जिस समय को कोशिका विभाजित होने लगती है, तब एक क्रोमैटिन सिकुड़ कर अनेक मोटे व छोटे धागों के रूप में संगठित हो जाते हैं। इन धागों को गुणसूत्र (Chromosome) कहते हैं। इन्हें आसानी से हम अपने सूक्ष्मदर्शी से भी देख सकते हैं। प्रत्येक जाति के जीवधारियों में सभी कोशिकाओं के केंद्रकों में गुणसूत्रों की संख्या निश्चित होती है जैसे मानव में 23 जोड़ें (= 46), मटर में 7 जोड़ें (= 14), आदि।
प्रत्येक गुणसूत्र में जेली के समान एक गाढ़ा भाग होता है जिसे मैट्रिक्स कहते हैं। मैट्रिक्स में दो परस्पर लिपटे महीन एवं कुंडलित सूत्र दिखाई देते हैं जिन्हें क्रोमोनिमेटा कहते हैं। प्रत्येक क्रोमोनिमेटा एक अर्ध्दगुणसूत्र कहलाता है। इस प्रकार प्रत्येक गुणसूत्र में दो क्रोमैटिडों का बना होता है। दोनों क्रोमैटिड एक निश्चित स्थान पर एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। जिसे सेण्ट्रोमियर (Centromere) कहते हैं|
गुणसूत्रों पर बहुत से जीन (Gene) स्थिर होते हैं। एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को जो लक्षण हस्तान्तरित होते हैं, वे जीनों के माध्यम से होते हैं। जीन ही हमारे अनुवांशिक गुणों के लिए उत्तरदायी होते हैं। चूंकि ये जीन गुणसूत्रों पर स्थित होते हैं, गुणसूत्रों के माध्यम से ही जीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तान्तरित होते हैं। इस प्रकार गुणसूत्रों में ही वे सब आवश्यक सूचनाएं निहित होती हैं जो कोशिका के कार्य करने वह अगली पीढ़ी में जनन के लिए आवश्यक होती हैं। इसलिए गुणसूत्रों वंशागति का वाहक कहा जाता हैं।
क्रोमैटिन के अलावा केंद्रक में एक (या अधिक) सघन गोल रचनाएं दिखाई पड़ती है। इसे केंद्रिका कहते हैं इसमें राइबोसोम के लिए RNA का संश्लेषण होता है|
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