यह स्वतंत्रता से पूर्व का सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथा विस्तृत कानून था। इसमें निम्नांकित प्रावधान किए गए थे-
* प्रांतों में द्वैध शासन का अंत कर दिया गया तथा प्रांतीय स्वायत्तता को मान्यता दी गई। तदनुरूप ग्यारह प्रांतों में उत्तरदाई सरकार की स्थापना की गई। इनमें से 6 प्रांतों में भी सदस्य व्यवस्थापिका का प्रावधान था। ये प्रांत थे - बंगाल, मद्रास, बंबई, संयुक्त प्रांत तथा बिहार
* इसका अधिनियम के माध्यम से पहली बार प्रांतों को एक स्वतंत्र संवैधानिक तथा कानूनी रूप प्राप्त हुआ।
* इस अधिनियम में 14 खंड तथा 10 अनुसूची थी जिसमें कुल मिलाकर 451 धाराए थी।
* इस अधिनियम के दूसरे खंड में संघीय व्यवस्था की अनुशंसा की गई थी जो कि ब्रिटिश भारत के प्रांतों, देशी राज्य तथा कमिश्नरों के प्रशासनिक क्षेत्रों को मिलाकर बनाया जाना था हालांकि प्रस्ताव लागू नहीं हो सका।
* संघ तथा द्वैध शासन व्यवस्था को लागू किया गया। वित्तीय शक्तियां अब पूरी तरह भारत को वापस कर दी गई।
* इस अधिनियम के अनुसार संघीय न्यायालय की स्थापना की गई किंतु अभी भी अंतिम या सर्वोच्च न्यायालय प्रिवी कौंसिल ही बना रहा।
* इस अधिनियम का सबसे विवादास्पद पहलू धारा 93 का समावेशन था जिसके अनुसार प्रांतीय गवर्नर विशेष परिस्थितियों में प्रांतीय सरकारों का नियंत्रण ले सकता था। इसी धारा पर कांग्रेस को विशेष आपत्ति थी।