चार्ल्स वुड के डिस्पैच के अंतर्गत स्थापित शिक्षा व्यवस्था के मूल्यांकन हेतु डब्लयू. डब्लयू. हंटर की अध्यक्षता में 1882 में सरकार ने एक 22 सदस्यीय उपरोक्त आयोग का गठन किया था। इस आयोग का कार्य विश्वविद्यालयों के कार्य की समीक्षा करना न होकर इसे केवल प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की समीक्षा तक ही सीमित रहना था। इसकी सिफारिशें निम्न थी -
1- सरकार को प्राथमिक शिक्षा के सुधार और विकास की ओर विशेष ध्यान देना चाहिए , जो कि स्थानीय भाषा और उपयोगी विषयों में हो । निजी प्रयत्नों का स्वागत हो , परंतु प्राथमिक शिक्षा उसके बिना भी डी जानी चाहिए। इसके अनुसार प्राथमिक शिक्षा गम्भीर रूप से पिछड़ी हुई है और इसे मजबूती से आगे बढ़ाया जाए । सेकंडरी शिक्षा के क्षेत्र में अच्छी प्रगति हुई है, बंगाल में तो विशेषकर जहां सहायता अनुदान की प्रथा लागू कर दी गई है।
2- इन प्राथमिक पाठशालाओं का नियंत्रण नवसंस्थापित जिला और नगर बोर्ड को दे दिया जाए। शिक्षा के लिए वे उपकर भी लगा सकते थे।
3- माध्यमिक शिक्षा के दो खंड हो, पहले में साहित्यिक शिक्षा दी जाए , जो विश्वविद्यालय के प्रवेश हेतु विद्यार्थी तैयार करे तथा दूसरे में , व्यावसायिक शिक्षा दी जाए।
4- आयोग ने यह भी सुझाव दिया कि प्रेसीडेंसी नगरो के अतिरिक्त अन्य सभी स्थानों पर महिला शिक्षा के विकास का अभाव है और इसे दूर करना चाहिए।
5- मुसलमानों ने शिक्षा के विकास पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। परंतु, धार्मिक शिक्षा विद्यालयों में देने से बचा जाए।
6- शारीरिक शिक्षा पर भी जोर देने की पहली बार संस्तुति की गई ।
1882 ईसवी के बाद एक महत्वपूर्ण बात पंजाब विश्वविद्यालय की उसी वर्ष स्थापना थी। इससे कलकत्ता विश्वविद्यालय का बोझ भी कम हो गया।