लॉर्ड कर्जन भारतीय शिक्षा को सुधारने का इच्छुक था। उसने मैकाले की नीति की आलोचना की और कहा कि वह देशी भाषा के विरुद्ध है । इसके पश्चात टॉमस रैले की अध्यक्षता में 1901 में एक आयोग नियुक्ति किया , जिसका उद्देश्य विश्वविद्यालय की स्थिति का अनुमान लगाना था। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा इसकी परिधि से दूर था । इस आयोग में दो भारतीय सदस्य भी थे - सैय्यद हुसैन बिलग्राम और गुरदास बनर्जी । इसी आयोग की सिफारिश पर 1904 में भारतीय विश्वविद्यालय अधिनियम पारित हुआ । इसके मुख्य प्रावधान निम्नलिखित थे -
1- विश्वविद्यालय अध्ययन तथा शोध के लिए प्रोफेसर और लेक्चरर की नियुक्ति के प्रबन्ध करे , प्रयोगशालाएं और पुस्तकालय स्थापित करे और विद्यार्थियों को सीधे शिक्षा देने का भार अपने लेे।
2- विश्वविद्यालय के उप सदस्यों की संख्या 50 से न्यून अथवा 100 से अधिक नहीं होनी चाहिए और ये उप सदस्य आजीवन न रहकर केवल 6 वर्ष के लिए होने चाहिए।
3- उप सदस्य मुख्य रूप से सरकार द्वारा मनोनीत होने चाहिए। चुने हुए सदस्यों की संख्या कलकत्ता, मुम्बई और मद्रास विश्वविद्यालय में अधिक से अधिक 20 और 15 होने चाहिए।
4- विश्वविद्यालयों पर सरकार का नियंत्रण बढ़ा दिया गया और सरकार को सीनेट द्वारा पारित प्रस्ताव पर वीटो दिया गया । सरकार सीनेट द्वारा बनाए गए नियमों परिवर्तन अथवा संशोधन कर सकती थी और यदि चाहे तो नए नियम भी बना सकती थी।
5- इस अधिनियम द्वारा अशासकीय कालेजों पर सरकार का नियंत्रण अधिक कड़ा बना दिया गया।
6- गवर्नर जनरल को इन विश्वविद्यालय की क्षेत्रीय सीमाएं निश्चित करने का अधिकार दिया गया।