महारानी विक्टोरिया का घोषणा पत्र

1858 में भारतीय प्रशासन अधिनियम के पारित होने के बाद  1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में हुए शाही दरबार में लॉर्ड कैनिंग ने इस अधिनियम द्वारा किए गए परिवर्तनों की विधिवत् घोषणा रानी विक्टोरिया के घोषणा पत्र द्वारा  की गई। यह घोषणा पत्र स्टैनली द्वारा तैयार किया गया था। इस घोषणा पत्र में जो बातें और वायदे किए गए थे , समय गुजरने के साथ ही यह स्पष्ट होता गया कि ब्रिटिश सरकार ने तत्कालीन परिस्थितियों में भारतीयो को केवल लुभाने के लिए ऐसी घोषणा की थी 

              विक्टोरिया ने इस घोषणा में ये कहा था कि भारतीयों के धार्मिक एवं सामाजिक जीवन में अब किसी तरह का हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और इस क्षेत्र में अधिकारियों एवं ईसाई मिशनरियों के द्वारा किया गया आज्ञा का उल्लंघन रानी की अत्यधिक  अप्रसन्नता का कारण होगा। भारतीय प्रशासन में नियुक्ति के दौरान किसी भी प्रकार से जाति एवं धर्म को आधार नहीं बनाया जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति को निष्पक्षता से उसकी योग्यता एवं क्षमता के आधार पर नियुक्ति किया जाएगा। लॉर्ड डलहौजी ने जमीदारो से जिस भूमि को छीन लिया था, उसने उसकी फिर से रक्षा का आश्वासन दिया और भारतीयों के अपने पैतृक भूमि से लगाव एवं परम्परागत अधिकार को ही स्वीकार किया । देशी रियासत के  नरेशो से उसने अपनी ओर से समस्त संधियों के पालन का आश्वासन दिया। सार्वजनिक कार्य का संचालन समस्त भारतीय जनता के हित में किए जाने की बात कही गई । इसके अतिरिक्त आंतरिक शांति की स्थापना के पश्चात भारत में उद्योगों की स्थापना में वृद्धि करने की भी बात कही गई।

        इस प्रकार इस घोषणा में निसंदेह को बाते की गई यदि उसे ईमानदारी से लागू किया जाता तो निश्चित रूप से वे भारतीयों का विश्वास जीत पाने में सफल रहते , लेकिन सभ्य देश का तथाकथित प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले इन अंग्रेज़ो ने असभ्यता का ऐसा परिचय दिया जिसका मिसाल अन्यत्र मानव जगत में दुर्लभ था। उनके कर्मों से कभी ऐसा नहीं लगा कि वे वास्तव में सच्चे मन से अपने वायदे को लागू करना चाहते हैं। इसलिए पूरा का पूरा आश्वासन धरे के धरे  रह गए । कहा जाता है कि विक्टोरिया ने जन बूझ कर अपने घोषणा पत्र की भाषा को मधुर एवं संतोषजनक बनाने का आदेश दिया था।

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