विद्रोह की समाप्ति के पश्चात 1858 में भारतीय प्रशासन अधिनियम पारित कर कम्पनी के शासन का अंत के दिया गया। भारत का शासन ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया ओर से चलाया जाना था । 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट के अंतर्गत स्थापित द्वैध शासन ( कोर्ट ऑफ डायरेक्टर एवं बोर्ड ऑफ कंट्रोल) को अब समाप्त कर दिया गया और वहां पर एक भारत सचिव और उसके परामर्श दात्री संस्था के रूप में एक 15 सदस्यीय समिति इंडियन काउंसिल की नियुक्ति की गई। भारत के गवर्नर जनरल को अब वायसराय कह कर पुकारा जाने लगा जिसका तात्पर्य होता है सम्राट या साम्राज्ञी का व्यक्तिगत प्रतिनिधि । भारतीय नरेशों को विक्टोरिया ने अपनी ओर से समस्त संधियों के पालन करने का आश्वासन दिया, लेकिन साथ ही नरेश से भी उसी प्रकार के पालन की आशा की।
भारत के धार्मिक जीवन में किसी भी प्रकार के ईसाईयों के हस्तक्षेप की बात को अस्वीकार कर दिया गया और क्षेत्र में किया गया ब्रिटिश अधिकारियों के द्वारा कोई हस्तक्षेप महारानी के असंतोष का कारण बनेगा । पील कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय सेना में यूरोपीय सैनिकों की संख्या बढ़ा दी गई। उच्च सैनिक पदो पर भारतीयों की नियुक्ति को बन्द कर दिया गया। तोप खाने पर पूर्ण रूप से अंग्रेजी सेना का अधिकार गया । अब सेना में भारतीयो और अंग्रजों का अनुपात 2:1 का हो गया । मुंबई और मद्रास में 2:5 के अनुपात में सेना रखी गई । विद्रोह के फलस्वरूप सामंतवादी ढांचा चरमरा गया ।आम भारतीयों में सामंतवादियो की छवि गद्दारों की हो गई, क्योंकि इस वर्ग ने विद्रोह को दबाने में अंग्रेज़ो को सहयोग दिया था । 1857 के विद्रोह बाद 1858 उपनिवेशवाद के एक नवीन चरण वित्तीय पूजीवाद का चरण प्रारम्भ हुआ । जिसकी वजह से आर्थिक शोषण के एक नए युग की शुरुआत हुई। भारतीयों के प्रशासन में प्रतिनिधित्व के क्षेत्र में एक सूक्ष्म प्रयास करते हुए 1861 का भारतीय परिषद् अधिनियम पारित किया गया। भारतीयों को प्रशासन में शामिल करने का दिखावा ही सही एक सूक्ष्म प्रयास , पहली बार इसी अधिनियम के अन्तर्गत किया गया । विद्रोह के परिणाम स्वरूप भारतीयों में राष्ट्रीय एकता की भावना का विकास हुआ , जिसका कालांतर में राष्ट्रीय आंदोलन में अच्छा योगदान रहा। चूंकि इस विद्रोह के दौरान अधिकांश नेतृत्वकर्ता मुस्लिम थे, इसलिए विद्रोह के तत्काल बाद मुस्लिमो के विरुद्ध अंग्रेज़ो ने दमनात्मक नीति का पालन प्रारम्भ कर दिया।