डॉलर और रुपए की परिवर्तनीयता

हाल ही में डॉलर के सापेक्ष रुपए के मूल्य में काफी गिरावट आई है यह गिरावट प्रति डालर ₹70 के ऊपर निकल गई है। जिसका प्रभाव हमारी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक वह सकारात्मक दोनों रूप में पड़ता है यदि गिरावट एक निश्चित सीमा के अंदर रहे तो फायदेमंद हो सकती है लेकिन इस प्रकार की गिरावट अर्थव्यवस्था को नकारात्मक रूप से प्रभावित ही करती है।

              स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से लगातार रुपए के मूल्य में गिरावट आई है। और स्वतंत्र रूप से रुपए का मूल्य कम होता जा रहा है इस रुपए की गिरावट का मुख्य कारण हमारे आयात और निर्यात में असंतुलन की स्थिति है। वर्तमान में लगभग 80 बिलियन डॉलर का व्यापार घाटा इस वर्ष हुआ है।

             रुपए में उतार-चढ़ाव को हम बाजार में सब्जी के भाव से समझ सकते हैं जैसे प्याज कभी ₹20 किलो और कभी ₹70 किलो बिकता है। इसका सीधा से तात्पर्य है कि जब प्याज की आपूर्ति में कमी आ जाती है तो मूल्य में वृद्धि हो जाती है क्योंकि मांग में कोई कमी नहीं होती है। इसी प्रकार जब डॉलर की तुलना में रुपए की कमी होने लगती है तो रुपए का मूल्य डालर की तुलना में गिरने लगता है वर्तमान में भी यही हो रहा है। 

             यदि हमारा व्यापार संतुलित रहे तो रुपए की परिवर्तनीयता पर कोई प्रभाव नहीं आएगा क्योंकि तब हम जितना आयात करते हैं उतना ही निर्यात कर देते हैं कहने का तात्पर्य हम आयात डालर में करते हैं और निर्यात भी डॉलर में करते हैं क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार अमेरिकी डॉलर में होता है इसलिए जितने डॉलर की हमें आवश्यकता होती है हम उतने डॉलर निर्यात के द्वारा प्राप्त कर लेते हैं लेकिन भारत में निरंतर व्यापार घाटा बना रहता है जिसकी पूर्ति के लिए हम अन्य साधनों पर निर्भर रहते हैं। जिसमें भारतीय रिजर्व बैंक भी अपनी नीतियों के सहारे इस परिवर्तनीयता को संतुलित करने का प्रयास करता है।

              

      

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