पारसी सुधार आंदोलन

19वीं शताब्दी में समाज सुधार आंदोलन का प्रभाव पारसी समाज में भी दिखाई देता है। पारसी समाज में सुधारों की प्रक्रिया 19वीं शताब्दी के मध्य में मुंबई से प्रारंभ हुई। वस्तुत व्यापारिक संस्थाओं के माध्यम से अंग्रेजों के साथ अधिक समय से घनिष्ठ संबंध रहने के कारण भारतीय लोगों में पाश्चात्य प्रभाव पहले आ गया था। इस समाज में जाति - पाती एवं खान पान संबंधी प्रतिबंध ना होने के कारण इनके द्वारा अंग्रेज मेहमानों की सेवा, घर एवं बाजार दोनों स्थानों पर कर ली जाती थी। धीरे-धीरे पारसी अंग्रेजों की सेवा में जाने लगे। यह लोग यूरोपियों एवं भारतीयों के बीच बिचौलियों के रूप में भी काम करने लगे। अंग्रेजों के संपर्क की कारण सीधी पारसी समुदाय के लोगों ने अंग्रेजी भाषा सीखना प्रारंभ कर लिया। स्कूल, कॉलेजों और ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों में भी बड़ी संख्या में पार्टी छात्र जाने लगे थे। पाश्चात्य शिक्षा एवं पारसी समाज में प्रसार - प्रचार मुंबई समाचार नामक पत्र से प्रारंभ हुआ। 1848 में दादा भाई नौरोजी ने फारसी युवाओं को संगठित करना प्रारंभ कर दिया।

पारसी समाज का लंबे समय तक हिंदू समाज के साथ अंत क्रिया होने के कारण उन्होंने हिंदुओं के अनेक रीति-रिवाजों जैसे होली में नारियल देना, हनुमान को तेल के प्याले चढ़ाना आज को अपना लिया था। पश्चात शिक्षा एवं संस्कृति के प्रभाव के कारण भारतीय समाज इन परंपराओं एवं ब्राह्म आडंबरों से मुक्त होना चाहता था। उनके द्वारा जोरोस्ट्रियन धर्म के शुद्ध रूप पर बल दिया जाने लगा।

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