डॉलर और रुपये की परिवर्तनियता - 2

                   अंतरराष्ट्रीय व्यापार घाटा के कारण भारत में डालर की कमी बनी रहती है जिसके कारण भारत में रुपए का अवमूल्यन होता रहता है जिसे रिजर्व बैंक के प्रयास से रोकने का प्रयास किया जाता है जैसे वर्तमान में रुपए का अवमूल्यन होने पर रिजर्व बैंक द्वारा डॉलर की बाजार में आपूर्ति की गयी।

           भारत में डालर की आपूर्ति में कई माध्यमों से होती है। 

           भारत में विदेशी निवेश के द्वारा डालर की आपूर्ति की जाती है इसीलिए भारत सरकार द्वारा विदेशी निवेश को बढ़ाने के लिए उदार नीतियों का सहारा लिया जाता है यह निवेश भारत में दो प्रकार से आता है प्रथम प्रत्यक्ष विदेशी निवेश जिसका प्रयोग संरचनात्मक ढांचे में किया जाता है ।द्वितीय, पोर्टफोलियो निवेश होता है यह पैसा विदेशी निवेशक शेयर बाजार में लगाते हैं इन दोनों माध्यमों में हमें डालर की प्राप्ति होती है जो व्यापार घाटे को संतुलित करने में मदद करती है।

                  भारत में डॉलर का एक अन्य प्रमुख माध्यम भारतीय अंतरराष्ट्रीय कंपनियां है यह कंपनियां विदेशों में सेवाओं के माध्यम से डॉलर का अर्जन करती हैं और भारत में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रुपए में डालर का परिवर्तन करती हैं कुछ भारतीय अंतर्राष्ट्रीय कंपनियां है - जैसे इंफोसिस ,एयरटेल ,टाटा कंसलटेंसी आदि। 

                इसके अतिरिक्त विदेशों में काम करने वाले प्रवासी भारतीयों द्वारा भारत में भेजा गया धन, जिसके माध्यम से हमें डालर की प्राप्ति होती है। साथ ही भारत आए विदेशी पर्यटकों से भी हमें डालर की प्राप्ति होती है क्योंकि यह लोग भारत में डालर लेकर आते हैं जिसे रुपए में परिवर्तित कराके, भारत में भ्रमण करते हैं ।इसीलिए वर्तमान सरकार भारत में पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रयास कर रही है क्योंकि हमारे यहां विश्व के लगभग 1% ही पर्यटक आते हैं।

                   इन सब के बावजूद भारत की आवश्यकताओं के अनुसार डालर की प्राप्ति नहीं हो पाती है जिसके कारण रुपए का अवमूल्यन होने लगता है क्योंकि हमारा आयात लगातार बढ़ता जा रहा है जिसमें हमें डालर खर्च करना पड़ता है जबकि हमारा निर्यात कम होता जा रहा है जिसके कारण हमें डालर की प्राप्ति कम हो रही है।

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