POCSO ACt

POCSO ACT  बालकों के प्रति होने वाले यौन शोषण के प्रतिषेध के लिए बनाया गया कानून है ।

भारतीय संविधान लागू होने के बाद किशोरों के लिये अलग कानून की आवश्यक्ता अनुभव की गई ।इसलिए यह अधिनियम संविधान द्वारा 1992 मैं शामिल किया गया जो अमेरिका के संविधान से लिया गया । वर्ष 2012 मैं यह कानून का रूप ले चूका था।

भारत में बाल लैंगिक अत्याचार कानूनों का आध्याधेश भारत की बाल संरक्षण नीतियों का हिस्सा है। भारत के संसद ने 'बालकों का लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम 2011' को 22 मई 2012 में पारित किया, जिससे वह ' बालकों का लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम 2012' बन गया और 14 नवंबर 2012 से लागू हो गया। भारत में रहने वाले कुल बालकों में लगभग 53% बालकों ने किसी न किसी तरह का लैंगिक अत्याचार का सामना किया गया है।

इस कानून द्वारा किए गए उपबंध बालक और बालिका दोनों के लिए समान रूप से लागू होते हैं।बालक और बालिका दोनों पर होने वाले अत्याचारों को सामान्य श्रेणी में दृष्टिगत करते हुए इस कानून का प्रावधान किया गया है।

संविधान के इस अधिनियम के अंतर्गत यौन अपराध यौन छेड़छाड़ व अश्लील चित्र या video बनाने के अपराधों के प्रतिषेध कृत कानून है अन्य दंड प्रावधानों के अतिरिक्त कुछ धाराओं के अंतर्गत उम्र कैद तक की सजा का भी प्रावधान है।

विशेष नये संशोधन के अंतर्गत बालक अपने ऊपर हुए अपराधों की FIR करने के उपरांत आरोपी को अपने को निर्दोष साबित करना होता है बच्चे को अपराध हुआ इसके लिए सिर्फ आरोप लगाना पर्याप्त है इस कानून के अंतर्गत बालक बालिका दोनों को समान रूप से सुरक्षा प्रदान की गई है विशेष न्यायलय बालक के प्रति अपराध की गम्भीरता व उसे हुए सामाजिक व मानसिक नुकसान का आकलन करता है। सामाजिक   शैक्षणिक बौद्धिक भावनात्मक व शारीरिक नुकसान के अनुसार दंडात्मक कार्यवाही करता है ।2012 के अधिनियम से पहले 'goa बाल अधिनियम 2003' बाल लैंगिक अत्याचार से संबंधित इकलौता ऐसा क़ानून था। 2012 से पहले बाल लैंगिक अपराध भारतीय दंड प्रक्रिया 1860 के इन धाराओ के अंदर आते थे-

धारा 375-बलात्कार जैसे कृत्य

धारा 354- औरत की लज्जा को भंग करना

धारा 377- अप्राकृतिक अपराध

उपर्युक्त धाराओं के अंतर्गत इस अधिनियम को मजबूती प्रदान की गई और बालको के लिए एक सुरक्षा अधिनियम पारित किया गया है।

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