आजादी से पूर्व -
वस्त्र उद्योग के अंतर्गत सूती वस्त्र रेशमी वस्त्र एवं जूट उद्योग सम्मिलित है परंतु इन सभी में भारतीय अर्थव्यवस्था में सूती वस्त्र उद्योग का योगदान है यह उद्योग कुल औद्योगिक उत्पादन में 20 % का उत्पादन करते हैं इसी प्रकार देश GDP 5 % का है तथा औद्योगिक क्षेत्र के द्वारा किए गए कुल रोजगार का सृजन में 18 % का योगदान दिए गए हैं इस प्रकार अर्थव्यवस्था में व्यापक योगदान है
18वीं शताब्दी में भारत विश्व के एक महत्व सूती वस्त्र निर्यातक देश में शामिल था परन्तु ईस्ट इंडिया कंपनी राजनीतिक सत्ता स्थापित होने के बाद धीरे-धीरे इस उद्योग पतन होने लगा भारत में पहला सूती वस्त्र 1818 में पश्चिम बंगाल के फोर्ट ग्लोस्टर नाम का स्थान पर लगाया गया जो जो असफल रहा था आधुनिक गढ़ की प्रथम सूती वस्त्र उद्योग 1854 में कावसजी नामा के द्वारा लगाया गया था परंतु आजादी से पूर्व इस उद्योग का सीमित विकास रहा वैसे स्वदेशी आंदोलन के प्रथम विश्वयुद्ध एवं द्वितीय विश्व युद्ध के समय उपयोग का विकास भी हुआ इस समय लंका सयार मैचेस्टर के उद्योग युद्ध जन सामग्री की आपूर्ति में लगे थे ।
आजादी के बाद -
आजादी के बाद सूती वस्त्र उद्योग का विकेंद्रीकरण विकास हुआ क्योंकि एक शुद्ध कच्चे माल पर आधारित उद्योग है अतः इसकी स्थापना कपास उत्पादन से बाहर के क्षेत्रों में भी की जा सकती है कि इसके अतिरिक्त रेलवे सड़क जैसे परिवहन साधनों के विकास के कारण यह कच्चे माल का उत्पादन केंद्र से दूर भी स्थापित हुए हैं इसके अलावा सालो भार माग का विकास तेजी से हुआ दक्षिण भारत जल विद्युत सुविधा के विकास के कारण सूती वस्त्र उद्योग का तेजी से विकास हुआ आजादी के समय मिलों की संख्या 451 थी जो वर्तमान में बढ़कर कुल संख्या वर्तमान 1782 हो चुकी है जिसमें 192 सहकारी क्षेत्र में 151 निगम क्षेत्र के अंतर्गत 1439 निजी क्षेत्र के अंतर्गत कार्यरत हैं ।