1838 में डब्लू. एफ. आॅसबर्न ने लिखा था कि 'हमें रणजीत सिंह की मृत्यु के पश्चात पंजाब को तुरन्त जीत लेना चाहिए और सिंध को अपनी सीमा बना लेना चाहिए। कंपनी तो बड़े-बड़े ऊंटों को खा चुकी है, इस मच्छर की तो बात ही क्या है।'
1844 ईस्वी लॉर्ड ऐलनबरो की जगह लॉर्ड हार्डिंग गवर्नर जनरल बन कर भारत आया। लॉर्ड हार्डिंग ने मेजर ब्रॉडफूट खुद को पेशावर से पंजाब तक नियंत्रण का स्पष्ट निर्देश दिया।
युद्ध की विस्तृत व्याख्या में ना जाते हुए एकमात्र इतना ही कह देना पर्याप्त होगा कि 1845-46 में हुए प्रथम अंग्रेज-सिख युद्ध का परिणाम अंग्रेजों के पक्ष में रहा। इस युद्ध के अंतर्गत मुक्की, फिरोजशाह, बद्दोवाल तथा आलीवाल की लड़ाइयां लड़ी गई। यह चारों लड़ाइयां निर्णायक नहीं थी परंतु पांचवी लड़ाई सब राव की लड़ाई( 10 फरवरी 1846 ईसवी) निर्णायक सिद्ध हुई। लाल सिंह और तेज सिंह जिन्होंने सिखों की कमजोरियों का भीड़ अंग्रेजी को दे दिया और युद्ध मैं बिना लड़े पलायन किया कि विश्वासघात के कारण ही सिखों की पूर्णता हार हुई सिखों ने 9 मार्च 1846 को लाहौर संधि पर हस्ताक्षर किया। लाहौर की संधि से लॉर्ड हार्डिंगे ने लाहौर की आर्थिक साधनों को नष्ट कर दिया पंजाब की संधि के अनुसार कंपनी की सेना को दिसंबर 1846 तक पंजाब से वापस हो जाना था, परंतु हार्डिंगे यह तर्क दिया,कि महाराजा के वयस्क होने तक सेना का वहां रहना अनिवार्य है। उसने सामंतो को प्रलोभन तथा सख्त के द्वारा इस बात को मनवाने का प्रयास किया। परिणामतः 22 दिसंबर 1846 को 'भैरववाल की संधि' हुई जिसके अनुसार दिलीप सिंह के संरक्षण हेतु अंग्रेजी सेना का पंजाब में प्रवास मान लिया गया।