स्वराज्यवादी आंदोलन

असहयोग आन्दोलन की समाप्ति के पश्चात किस तरह के कार्य किए जाए कि भारत में राष्ट्रीयता की भावना बनी रहे , इस बात को लेकर कांग्रेस के अंदर दो तरह की विचारधाराएं उत्पन्न हुई - परिवर्तन कामी तथा परिवर्तन विरोधी । परिवर्तन कर्मियों में चितरंजन दास , मोती लाल नेहरू , विट्ठल भाई पटेल, हाकिम अजमल खान , जबकि परिवर्तन विरोधियों में चक्रवर्ती राजगोपालाचारी , डॉ.राजेंद्र प्रसाद , बल्लभ भाई पटेल, हसन इमाम आदि प्रसिद्ध थे।

          परिवर्तन कामियो का यह मानना था कि 1919 के अधिनियम के अन्तर्गत नवंबर 1923 में होने वाले दूसरे चुनाव में कांग्रेस को भाग लेना चाहिए। इसके लिए असहयोग आन्दोलन के कार्यक्रम में शामिल चुनाव के बहिष्कार के कार्यक्रम में परिवर्तन लाया जाना चाहिए। इसके विपरीत परिवर्तन विरोधियों का यह कहना था कि चुनाव के बहिष्कार के कार्यक्रम में किसी भी प्रकार का परिवर्तन न हो और इस दौरान गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रम के तहत अस्पृश्यता उन्मूलन , हिन्दू मुस्लिम एकता को बढ़ावा देना, चरखे एवं खादी का प्रचार प्रसार , गांव गांव में पंचायतों की स्थापना करना जैसे कार्यक्रम आते थे।

         इसी ऊहा पोह की स्थिति में दिसंबर 1922 में चितरंजन दास की अध्यक्षता में गया में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन आयोजित हुआ , जिसमें चितरंजन दास ने चुनाव में भागीदारी  से संबन्धित एक प्रस्ताव रखा , जिसे बहुमत से खारिज कर दिया गया।

       चितरंजन दास ने तब अध्यक्ष पद से त्यागपत्र देकर इलाहाबाद में जनवरी 1923 में एक अखिल भारतीय कांग्रेस खिलाफत स्वराज्य पार्टी का गठन किया, जिसे संक्षेप में स्वराज्य दल कहकर पुकारा गया। इस दल के अध्यक्ष सी. आर. दास, जबकि सचिव मोतीलाल नेहरू को बनाया गया।

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