स्वराज्य वादियों ने फ़रवरी 1923 में अपने कार्यक्रम को प्रकाशित करवाया , जिसमें अपने तात्कालिक उद्देश्य उसने जिक्र किया था- " शीघ्र अतिशीघ्र पूर्ण प्रभुसत्ता का स्तर प्राप्त करना , जिसमें भारतीय परिस्थितियों एवं मानसिकता की पृष्ठभूमि को ध्यान में रखते हुए संविधान तैयार करने का अधिकार भी शामिल था ।"
सितम्बर 1923 में दिल्ली में मौलाना अबुल कलाम आजाद की अध्यक्षता में सम्पन्न कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में स्वराज्य वादियों को चुनाव में भागीदारी का अधिकार प्रदान कर दिया, साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस एक संस्था के रूप में इस चुनाव में किसी तरह के उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं करेंगी।
14 अक्टूबर 1923 में इस दल के प्रकाशित घोषणा पत्र का अध्ययन करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि स्वराज्य पार्टी पूरी प्रादेशिक स्वायत्तता चाहती थी। साथ ही इसका एक अन्य उद्देश्य इस सिद्धान्त को मान्यता दिलाना था कि नौकरशाही अपनी शक्ति जनसमूहों से प्राप्त करती है। इसके अलावा वे सरकारी तंत्र एवं प्रणाली पर भारतीय जनता के अधिकार की मांग स्वीकार करने के लिए दबाव डालेंगे । यदि सरकार इन मांगों पर ध्यान नहीं देती है तो एक रूपी निरंतर एवं स्थाई व्यवधान की नीति अपनाई जाएगी।
अपनी असफलता के बावजूद भी स्वराज्य वादियों ने आंदोलन के पड़ाव वर्ष में आंदोलन के सर्वथा नवीन तरीको को जन्म देकर भारत में राष्ट्रीयता की भावनाओ को बनाए रखा और यही इसकी मुख्य उपलब्धि रही।