फ्रांस की सामाजिक दशा

                      फ्रांस की सामाजिक दशा

16वीं शताब्दी में फ्रांसीसी समाज तीन वर्गों में विभिक्त था। प्रथम वर्ग कुलीनों का, दूसरा वर्ग पादरियों का और तीसरा वर्ग साधारण जनता का था। तीनों वर्गों में प्रथम दो वर्ग शक्तिसम्पन्न और विशेशाधिकार प्राप्त प्रभावशाली वर्ग थे। इन्हें राजकीय करों की अदायगी नहीं करनी पड़ती थी। तीसरा वर्ग साधारण जनता का था। राजकीय करों का संपूर्ण भार इसी वर्ग को वहन करना पड़ता था। इतिहासकारों ने उस काल की स्थिति का वर्णन इस प्रकार किया है-कुलीन युद्ध करते हैं, पादरी र्इशवर की पूजा करते हैं और जनता करों की अदायगी करती है। जो व्यक्ति जितना अधिक धनवान होता था उसे उतने ही कम कर सरकार को देने पड़ते थे। इस प्रकार उस समय के समाज के वर्गों में अमीर-गरीब, अधिकारों और स्थिति के आधार पर बहुत अधिक अंतर था।
  1. कुलीन वर्ग - उस काल के यूरोपीय समाज में कुलानों और सामंतों के अधिकार असीम और प्रभाव बहुत अधिक थे। उन्हें राजपरिवार के बाद समाज के सबसे ऊँचा स्थान प्राप्त था। राज्य, सेना और चर्च के सभी ऊँचे-ऊँचे पद इन्हीं को प्राप्त थे। इन पदों को ऊँची बोली पर नीलाम किया जाता था। राज्य की अधिकांश भूमि इन्हीं कुलीनों में विभक्त थी। ये लोग अपनी जमींदारी में कृशकों से तरह-तरह के कर वसूल करते, नजराने खेते, भेंट करते तथा बेगार लेते थे। कृशकों को सप्ताह में कर्इ दिन इनकी भूमि बेगार में जोतनी पड़ती थी। कुलीन सामंतों के लिए विशाल शिकारगाह बने थे। शिकारगाहों में तरह-तरह के जंगली पशु भारी संख्या में रहते थे। जंगली पशु कृशकों के खेतों को हानि पहंचु ाते रहते थे, परंतु कृशक उन्हें खेतों से भगा नहीं सकते थे।
  2. पादरी वर्ग - कुलीनों की भाँति पादरियों को भी विशेषाधिकार मिले हुए थे। इन लोगो में भी दो श्रेणियां थी। प्रथम श्रेणी के पादरी कुलीनों और सामंतों की संतान थे। चर्च से इन्हें लाखांे रुपये वार्शिक की आय थी। ये भी कुलीनों की तरह राजसी ठाठ-बाट से जीवन व्यतीत करते थे। इनका संपूर्ण समय राग-रंग में व्यतीत होता था। धार्मिक कार्यों को संपन्न करने में इनकी रुचि नहीं थी। बड़े पादरियों में से कुछ ऐसे भी थे जिनका र्इशवर के अस्तित्व में विशवास नहीं था। इसी कारण से लुर्इ सोलहवंे ने पेिरस के आर्कबिशप की नियुक्ति करते समय कहा था कि हमें कम से कम फ्राँस की राजधानी में तो र्इशवर में आस्था रखने वाले पादरी को नियुक्त करना चाहिए। सभी प्रकार की धार्मिक क्रियाएं दूसरी श्रेणी के पादरियों को करनी पड़ती थी। ये छोटे पादरी कहलाते थे। इन्है। साधारण वर्ग में से नियुक्त किया जाता था तथा 25 पौंड वार्शिक वेतन दिया जाता था। कम वेतन के कारण ये लोग भिक्षुओं जैसा जीवन बितात थे। 
  3. साधारण वर्ग- इस वर्ग में कृशक मजदूर, कारीगर, शिल्पकार और दुकानदार आदि सम्मिलित थे। यूरोपीय जनसंख्या का 85 प्रतिशत से भी अधिक भाग साधारण वर्ग का था। इसमें लगभग 25 लाख शिल्पी, दस लाख अर्द्धदास कृशक और दो करोड़ कृशक थे। उन्हें रहने के लिए मकान, खाने के लिए भोजन और तन ढकने के लिए कपड़े तक का अभाव था। इन पर करों का भारी भार लदा था। अत: अपनी जमींदारों और चर्च तीनों को अलग-अलग कर देने पड़ते थे। कृशकों की अपनी संपूर्ण आय का 80 प्रतिशत से अधिक करों के रूप में देना पड़ता था। अत: अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उनके पास बहतु कम धन बच पाता था। अर्द्धदास कृषकों को अपनी अनाज और मुर्गियाँ तक जमींदार को देनी पड़ती थीं और सप्ताह में लगभग छह दिन तक जमीदार के खते ों में काम करना पड़ता था। स्वतंत्र कृशकों को इन सबके बदले नाम कीट रेटं नामक कर देना पड़ता था। कृशक की मृत्यु हो जाने पर उसकी संतान को दुगना कर देना पड़ता था। उन्हें चर्च को भी अपनी उपज का दसवां भाग देना पड़ता था। अपने खेतों की उपज पर उन्हें सड़कों और पुलों के लिए टाले टैक्स तथा तरह -तरह की चंुि गयाँ देनी पड़ती थी। सड़कों की मरम्मत तो उन्हें ही करनी पड़ती थी। सरकारी करों का भारी बोझ भी उन्है। ही सहन करना पड़ता था। नगरों में कारीगरों और श्रमिकों की दशा अच्छी नहीं थी। व्यापारिक संस्थाओं का उन पर नियंत्रण था। वे ही उनके काम के घंटों, छुट्टियों और वते न आदि का निधार्र ण करती थी। श्रमिकों का जीवन स्तर सबसे नीचा था। साधारण वर्ग में सबसे श्रेश्ठ जीवन व्यापारियों का था। उनके पास धन सम्पित्त के भण्डार भरपूर थे। वे राजा तथा कुलीनों को ऋण देते थे।
  4. मध्यम वर्ग - पढ़े लिखे व्यक्तियो, डॉक्टरों, दाशर्निकों, वकीलों, लेखकों, कवियों और क्लकों आदि का एक अन्य वर्ग था जो मध्यम वर्ग के नाम से प्रसिद्ध था। इनका रहन-सहन ग्रामीण कृशकों और बाहर के शिल्पियों तथा कारीगरों से बहे तर था किन्तु इन्है। समाज और शासन दोनो में उपयुक्त स्थान प्राप्त नहीं था।
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