जिस तरह से मसाला फिल्में बन रही हैं जिन्हें पापुलर सिनेमा कहा जाता है। उसमें क्या बच्चों या फिर टीन एज के देखने लायक सब कुछ होता है ।अगर कोई मुझसे पूछे तो मैं इसका जवाब कहूंगा -हा ।।
लोग गाली बक रहे हैं ,क्राइम कर रहे हैं। नए नए तरीके से लोगों को मार रहे हैं। फ्लर्ट कर रहे हैं यह फिल्म में क्या गलत असर नहीं डालती हैं ।लेकिन जब होमोसेक्सुअल की कहानी सेंसिटिव अंदाज में पर्दे पर आती है तो बच्चों के खराब होने का डर हो जाता है ।जबकि यह सोसायटी के का ऐसा सच है जिसे चाह कर भी नकारा नहीं जा सकता है। अगर किसी के घर में कोई ऐसा बच्चा है तो उसे ऐसे नकारा जाता है जैसा उसका कोई वजूद ही नहीं है। कितने युवा इसे जिंदगी का कड़वा सच समझते हैं ।और अपनी जान तक दे देते हैं अगर इस सब्जेक्ट पर सोसाइटी को अवेयर करने के लिए फिल्म बनाई जाती है तो उसे रिलीज तक नहीं होने दिया जाता( जैसे कि हाल ही में रिलीज लिपिस्टिक इन अंडर माय बुर्का)कि उससे संस्कृति बिगड़ने का खतरा रहता है। आइटम नंबर देखने पर संस्कृति बदनाम नहीं होती है।
आप किसी की सोच पर कैंची नहीं चला सकते हैं ।फिल्म में करियर, फिल्म आर्टिस्ट होना इस देश का सबसे बड़ा गुनाह हो गया है ।मुझे बहुत दुख होता है जब मैं सोचता हूं कि हम एक डेमोक्रेटिक कंट्री में रहते हैं। वह भी दुनिया की सबसे बड़ी डेमोक्रेटिक कंट्री में लेकिन यही जब कोई फिल्में कर अपनी सोच की फिल्म बनाता है तो उसे लेकर लोग विरोध करने लगते हैं ।ताज्जुब होता है किस कंट्री में आर्टिस्ट अभी तक माइनॉरिटी ग्रुप में ही है ।अगर एक कलाकार की सोच कुछ अलग है वह इंटरटेनमेंट की दुनिया में कुछ अलग करके सोसायटी की मैसेज देना चाहता है तो वह गुनाहगार हो जाता है। फिल्मों को पास करने के लिए अलग बॉडी बनाई गई है वहां से फिल्म के पास होने के बावजूद उस फिल्म को लेकर विरोध क्यों किया जाता है ।एक कलाकार का काम यह है कि वह अपने विचारों को अपने तरीके से मनोरंजन की दुनिया में लाए लेकिन उसकी सोच जरा सी फारवर्ड या अलग हो तो लोग के सेंटीमेंट हो जाते हैं ।यहां सवाल उठता है कि आखिर जिस ने फिल्म बनाई उस कलाकार के सेंटीमेंट्स का क्या कोई मतलब नहीं होता ।क्यों लोग कुछ नया और कुछ अलग देखने से कतराते हैं क्यों वह फिल्मों को सिर्फ इंटरटेनमेंट का साधन समझते हैं। कलाकार की सोच पर अगर ऐसे ही सेन्सर की कैंची चलने लगे तो कोई नई सोच जन्म नहीं लेगी।