भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान ही भाषाई आधार पर राज्यों के गठन की मांग की गई थी। सर्वप्रथम 1912 ईस्वी में भाषाई आधार पर 3 राज्यों बिहार उड़ीसा असम का गठन किया गया। भाषाई आधार पर तेलुगू राज्य की स्थापना की मांग करने के लिए 1913 में आंध्र महासभा की स्थापना की गई थी।
1930 ईस्वी में कानूनी आयोग का गठन किया गया जिस आयोग ने जाति धर्म भाषा आर्थिक ही तथा भौगोलिक क्षमता के आधार पर राज्यों के गठन की सिफारिश किया था। इसके सिफारिश को मानते हुए 1936 ईस्वी में मुंबई प्रांत से अलग करके सिंध प्रांत का गठन किया गया ।स्वतंत्रता के पूर्व तथा बाद में भारत का प्रमुख राजनीतिक दल राजनीतिक कारणों से भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग का समर्थन करती थी।
27 नवंबर 1947 ईस्वी को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश एस के दर के नेतृत्व में चार सदस्यीय आयोग की नियुक्ति किया। आयोग का प्रमुख कार्य विशेष रूप से दक्षिण भारत में उठी इस मांग की जांच करना था कि भाषा के आधार पर राज्यों का पुनर्गठन उचित है या नहीं। आयोग ने 10 दिसंबर 1948 ईस्वी को 56 पेज का अपना रिपोर्ट संविधान सभा को सौंपा जिसमें भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विरोध किया गया था।