कृषि भारतीय अर्थव्यवथा का मेरुदंड है। जहां एक ओर प्रमुख रोजगार प्रदाता क्षेत्र है वहीं सकल घरेलू उत्पाद में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। देश की लगभग 65-70 प्रतिशत जनसंख्या अपनी आजीविका हेतु कृषि पर निर्भर है उनका भरण पोषण कृषि से ही होता है।कृषि की सकल घरेलू उत्पादन में भागीदारी लगभग 15.7 प्रतिशत है ।
देश की विशाल जनसंख्या की खाद्य आपूर्ति के अतिरिक्त श्रमिको के रूप में बड़ी संख्या में लोगो को रोजगार और कृषि उत्पादों के निर्यात से बहुमूल्य विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है। अनेक प्रमुख उद्योगों के लिए कच्चा माल भी उपलब्ध होता है। जैसे - सूती वस्त्र उद्योग, जूट उद्योग, चीनी उद्योग , चाय उद्योग , सिगरेट उद्योग और तंबाकू उद्योग आदि। कृषि राष्ट्रीय आय का एक प्रधान स्रोत है। कृषि जन्य उत्पाद व्यापार का एक प्रमुख और अभिन्न हिस्सा है। भारत द्वारा चाय , कपास , तिलहन, मसाला आदि का विश्व व्यापार होता है। कृषि जन्य उत्पादो के आंतरिक व्यापार से परिवहन कर एवं अंतरराष्ट्रीय व्यापार से तट कर की आय में वृद्धि होती है जो अर्थव्यवस्था के सुदृढ कर के लिए उपयोगी है।
कृषि की दशा एवं दिशा सम्पूर्ण राष्ट्र को प्रभावित करती है। कृषि उत्पादन मुद्रास्फीति दर पर अंकुश रखता है, उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करता है, कृषक आय में वृद्धि करता है तथा रोजगार प्रदान करता है। कृषि का आर्थिक महत्व के साथ साथ सामाजिक महत्व भी है। कृषि क्षेत्र निर्धनता उन्मूलन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। कृषि में फसल उत्पादन के अलावा पशुपालन , बागबानी, मत्स्य पालन, रेशम उत्पादन, वन वर्धन आदि सभी क्रियाओं को सम्मिलित करते हैं जो सीधे तौर पर भूमि से जुड़ी है।
स्थलाकृति और जलवायु की दशाओं के अनुकूल रहने से भारत के 55 प्रतिशत से भी अधिक क्षेत्र पर कृषि की जा सकती है जबकि विश्व औसत केवल 11% है । भारत में दो फसल आसानी से उगाई जा सकती हैं। यहां सिंचाई योग्य क्षेत्र का क्षेत्रफल शस्य भूमि उपयोग के बारे में सब कुछ ठीक नहीं है। सामान्य भूमि उपयोग में फसलों की प्रधानता है जिससे वनो बाग बगीचों और चरागाहों के लिए बहुत कम जमीन बची रह पाती है। फसलों में खाद्यान्य की प्रधानता है जिससे मुद्रा दायिनी फसलों , चारा फसलों हेतु बहुत कम क्षेत्र शेष रह पाता है। इसलिए विवेकपूर्ण और इष्टतम उपयोग हेतु रणनीति तैयार करके कृषि में सुधार किया जा सकता है।