Day- 79
स्वतंत्रता का अधिकार -
- संविधान के अनुच्छेद 19-22 में भारत के नागरिकों को स्वतंत्रता संबंधी विभिन्न अधिकार प्रदान किए गए हैं। चारों अनुच्छेद दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार-पत्र स्वरूप हैं और मूल अधिकारों के आधार स्तंभ है।
- अनुच्छेद 19(1) भारत के सभी नागरिकों को निम्नलिखित सात स्वतंत्रताएँ प्रदान करता है –
i) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता अनुच्छेद : 19 (1) (क)
ii) सभा करने की स्वतंत्रता अनुच्छेद : 19 (1) (ख)
iii) संघ बनाने की स्वतंत्रता अनुच्छेद : 19 (1) (ग)
iv) भ्रमण की स्वतंत्रता अनुच्छेद : 19 (1) (घ)
v) आवास की स्वतंत्रता अनुच्छेद :19 (1) (ड०)
vi) संपत्ति अर्जन की स्वतंत्रता : निरस्त
vii) पेशा, व्यापार, वाणिज्य की स्वतंत्रता : अनुच्छेद (19) (छ)
- 44 संविधान (संशोधन) अधिनियम, 1978 द्वारा अनुच्छेद 19 (1) (च) में दिए गए संपत्ति अर्जन की स्वतंत्रता का अधिकार मूल आधिकार के अध्याय से हटा दिया गया है और इसे अनुच्छेद 300 (a) के अंतर्गत संपत्ति का अधिकार शीर्षक में रखा गया है|
- अनुच्छेद 19 के दो भाग हैं - पहला भाग खण्ड (1) के रूप में अधिकारों की घोषणा है। दूसरे भाग में खण्ड (2) से (6) में वे मर्यादाएं दी गई हैं जो अधिकारों पर लगाई जा सकती हैं। यह मर्यादा खंड विशिष्ट अधिकार से सम्बध्द हैं। नीचे इन्हें सारणी के रूप में दिया गया है –
अधिकार मर्यादा खण्ड
i) वाक्-स्वातंत्रय [19(1)(क)] 19(2)
ii) सम्मेलन की स्वतंत्रता [19(1)(ख)] 19(3)
iii) संगम की स्वतंत्रता [19(1)(ग)] 19(4)
iv) अबाध संचरण और भारत के किसी 19(5)
भागमेन निवास करने की स्वतंत्रता
[19(1)(घ और (ड०))]
v) वृत्ति, उपजीविका और
vi) व्यापार का अधिकार [19(1)(छ)] 19(6)
- 97 वाँ संविधान (संशोधन) अधिनियम, 2011 के द्वारा सहकारी समितियां बनाने की स्वतंत्रता को संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(7) के तहत संगम या संघ बनाने के अंतर्गत मूल अधिकार का दर्जा दिया।
- वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था की आधारशिला है।
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में प्रेस की स्वतंत्रता, विज्ञापन की स्वतंत्रता, प्रदर्शनी या धरने की स्वतंत्रता, हड़ताल करने की स्वतंत्रता, जानने का अधिकार आदि सम्मिलित हैं।
(विशेष- भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फ़ैसले में कहा है कि देश के सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक, क़ानूनी या नैतिक अधिकार नहीं है। अदालत ने कहा है कि कर्मचारी संगठनों को अपनी माँगें मनवाने के लिए सामूहिक रुप से चर्चा करने का क़ानूनी अधिकार तो है पर वे हड़ताल नहीं कर सकते।)
- अनुच्छेद 20 में अपराधों के लिए दोषसिध्दि के संबंध में संरक्षण से संबंधित तीन उपबंध दिए गए हैं जो कि निम्नवत् हैं –
(1) कोई व्यक्ति किसी अपराध के लिए तब तक दोषी नहीं ठहराया जाएगा जब तक कि यह सिध्द ना हो जाय कि उसने उस समय किसी अधिरोपित विधि का उल्लंघन किया है तथा उस विधि के उल्लंघन के लिए निर्धारित दंड से अधिक भागी नहीं होगा।
(2) किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से अधिक अभियोजित और दण्डित नहीं किया जाएगा। (दोहरे दण्ड एवं अभियोजन से संरक्षण)
(3) किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति को स्वयं उसके विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। (स्वयं को अपराध में फंसाने से संरक्षण)
अभी शेष है...