Day - 82
- भारतीय संविधान की उद्देशिका में प्रारंभ से ही उद्घोषणा की गई कि उसका प्रायोजन सभी नागरिकों को विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्राप्त कराना है। उद्देशिका और अनुच्छेद 25 से 28 के उपबंध धर्म और उपासना के विषय में समानता की प्रत्याभूति देते हैं। 42 वें संशोधन ने उद्देशिका में ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द जोड़कर इस बात को स्पष्ट कर दिया है।
- अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मनाने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता –
1) लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य को बनाए रखते हुए सभी व्यक्तियों को धर्म को अभाध रूप से मानने एवं प्रचार करने का समान अधिकार होगा।
2) राज्य इस संबंध में ऐसी विधि बना सकेगा जो -
I. धार्मिक आचरण से सम्बध्द किसी राजनीतिक, वित्तीय या अन्य लौकिक क्रिया-कलाप का विनियमन या निर्बंधन करती है,
II.सुधार एवं सार्वजनिक कल्याण के लिए सार्वजनिक प्रकार की हिंदुओं के धार्मिक संस्थाओं को हिंदुओं के सभी वर्गों के लिए खोलने का उपबंध करती है।
III. कृपाण धारण करना और लेकर चलना सिख धर्म के मानने का अंग माना जाएगा।
IV. हिंदुओं के प्रति निर्देश का अर्थ सिख, जैन या बौद्ध धर्म के मानने वालों के प्रति भी निर्देश तथा संस्थाओं से तात्पर्य भी इन सभी की संस्थाओं से है। (अनुच्छेद 25)
शेष अगले नोट्स में ..