भारत में आर्थिक उदारीकरण पर निबन्ध

 उदारीकरण का तात्पर्य ‘उदार दृष्टिकोण’ से होता है फिर यह उदार दृष्टिको चाहे राजनैतिक क्षेत्र से सम्बंधित हो अथवा सामाजिक क्षेत्र से या फिर आर्थिक क्षेत्र से । यहाँ आर्थिक परिप्रेक्ष्य में उदारीकरण की नीति की चर्चा की जा रही है । इस नीति का तात्पर्य है : “सरकारों द्वारा आर्थिक क्रियाओं में न्यूनतम हस्तक्षेप” भारत ही नहीं वरन् समू विश्व भी हिंसा, भयानक नरसंहार के दौर से गुजर चुका है ।

वर्तमान समय आर्थिक कार्यक्रमों के सम्बंध में न केवल राजनेताओं बल्कि ‘जनसाधारण की भी रूचि नहीं राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के विविध पहलुओं के सम्बंध में 1991 में दिये गए । आर्थिक प्रतिबन्धों की न्यूनता को उदारीकरण कहते हैं । वर्तमान समय में सरकार द्वारा उदारीकरण की नीति को जोरदार सम मिल रहा है । जिसके फलस्वरूप अनेक बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भारत जैसे देशों पर हावी होना चाहती हैं ।उदारीकरण से पूर्व जो विदेशी कम्पनी भारत में थी उसने भी भारतीय साझेदारी के हितों पर कुठाराघात करते हुए अपनी पूंजी की भागीदारी बढ़ानी शुरू कर दी ।

सुधार कार्यक्रम के पहले चार साल तक भारतीय घरेलू कम्पनियों और विदेशी कंम्पनियों के बीच खुली प्रतिस्पर्द्धा की वकालत व वाले सभी उद्योग संगठनों ने अब यह कहना शुरू कर दिया है कि शत-प्रतिशत मालिय हक वाले विदेशी निवेश को अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।वास्तव में विगत वर्षों के सुधार कार्यक्रमों ने यह सबक दिया है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और विकसित देशों के साथ ‘भारत बहलाओं और हड़काओं’ की नीति का ठीक उसी प्रकार संचालन करना होगा। आर्थिक उदारीकरण से भारतीय अर्थव्यवस्था गतिशील एवं प्रतिस्पर्द्धात्मक तो बनेगी किन्तु विदेशी पूंजी पर आश्रिता, विदेशी आर्थिक उपनिवेशवाद की स्थापना एवं वृहद औद्योगिक वर्गों का समाज में वर्चस्व बढ़ेगा, जिससे गा बेरोजगारी बढ़ेगी, मुद्रा स्फीति की स्थिति का सामना करना पड़ेगा ।संसार की प्राचीनतम संस्कृतियों और सभ्यताओं का विकास उन्हीं क्षेत्रो में हुआ, जहां की भूमि और जलवायु ऐसी थी कि थोडे प्रयत्न में जीवनयापन के लिए पर्याप्त धन-धान्य पैदा किया जा सकता था ।साहित्य, कला और राजनीति की तरह आर्थिक क्षेत्र में भी भारतीयों ने नए प्रयोग किए और एक उत्तम अर्थव्यवस्था का विकास किया, जिसने भारत को आर्थिक दृष्टि से भी अति समृद्ध देश बना दिया ।कर-बसूली के आ मामलों में शासन अथवा राजा का हस्तक्षेप लगभग वर्जित था । शुक्र आदिग्कुछ चिन जहां राजा आर्थिक मामलों में दखल देता है, स्वय व्यापार करने लगता है, वहां का अनिष्ट होता है । राजा और शासक वर्ग की तरह कृषक और व्यापारी वर्ग भी धर्म से अनुशासित होता था ।इसकी यह आर्थिक समृद्धि विदेशी आक्रमणों का भी आक्रांता यहां केवल लूट के लिए आए । ब्रिटिश लोग भी भारत की आर्थिक समृद्ध और इसके साथ व्यापार करने हेतु ही इसकी ओर आकृष्ट हुए । अपनी सत्ता कायक कर बाद उन्होंने भारत का ब्रिटेन के हित में योजनाबद्ध ढंग से आर्थिक शोषण और दोहन किया ।आर्थिक व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता से इंकार नहीं किया जा सकता है । लेकिन सुधारवादी ढांचा भारत जेसे देश के लिए हानिकारक है ।

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