बाल मजदूरी:: चुनौतियां और समाधान

अक्टूबर 2014 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद कैलाश सत्यार्थी ने कहा है कि मुझसे एक सवाल अक्सर मुझसे पूछा जाता है। कि नोबेल पुरस्कार से आपके अंदर क्या बदलाव आया है इस पर मेरा हमेशा यही जवाब होता है जो समस्याएं में उठाता रहा हूं ।आखिरकार सर्वोच्च स्तर पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने उन्हें मान्यता दी है बाल मजदूरी को अंकिता दुनिया भर में समाज की गंभीर समस्या माना जा रहा है।

दुनिया में सबसे अधिक बाल मजदूर भारत में होने के कारण देश की बड़ी अविश्वसनीय स्थिति है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के अनुसार 2011 के नवीनतम आंकड़ों के आधार पर भारत में 5 से 14 वर्ष की आयु के 4980000 बाल मजदूर हैं। 2011 की जनगणना में यह संख्या 4350000 थी ।हालांकि सिविल सोसायटी के सूत्रों का दावा है कि बाल मजदूरों की संख्या इससे कहीं अधिक अर्थात 50000000 से भी अधिक है।

भारत में अभी बाल मजदूरी को गंभीर समस्या नहीं माना जाता अपने आस पास एक नजर दौड़ाईये हर कहीं आपको सड़क पर ,हर रेस्तराँ में, गैरकानूनी कारखानों में, खेतों में और घरों में बाल मजदूर काम करते दिख जाएंगे।

भारत गरीब देश है गरीबों को तो काम करना ही है यहां मैं इस मिथक का खंडन करता हूं असल में बाल मजदूरी ऐसी बुराई है जो गरीबों को चिरस्थाई बनाती है ।गरीबी और बाल मजदूरी के बीच वहीं आता है जो मुर्गी और अंडे के बीच है बाल मजदूरी गरीबी और निरक्षरता के दुष्चक्र को बढ़ावा देती है ।क्योंकि ऐसे बच्चे अशिक्षित बने रहते हैं और बार-बार अकुशल काम करते हैं जिससे भविष्य में रोजगार करने की उनकी क्षमता नष्ट हो जाती है। अगर गरीब बच्चे विद्यालयों में जाने तथा शिक्षा हासिल करने के बजाय मजदूरी के लिए ही बातें किए जा रहे हैं। तो वह कमजोर और असहाय व्यक्तियों के रूप में बड़े होंगे जो गरीबी निरक्षरता और दुर्व्यवहार के कभी खत्म ना होने वाले दुष्चक्र में फंसे रहेंगे।

इसलिए यह अति आवश्यक है कि गरीबी निरक्षरता और बाल मजदूरी को एक साथ निशाना बनाया जाए ।जब तक बाल मजदूरी का उन्मूलन नहीं होगा तब तक गरीबी का उन्मूलन नहीं किया जा सकता ।इस तरह माता-पिता की गरीबी खत्म किए बिना बाल मजदूरी को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है।

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