बहावी आंदोलन मूलतः पुनस्थरपनावादी आंदोलन था। वस्तुतः यह आंदोलन कट्टर मुसलमानों के पाश्चात्य चुनौती के विरुद्ध सर्वप्रथम प्रतिक्रिया थी। इस आंदोलन को भारत में सैयद अहमद द्वारा प्रारंभ किया गया। आंदोलन से संबंधित विचार मूलतः अब्दुल बहाव एवं वलीउल्लाह में दिखाई देते हैं। वलीउल्लाह 18वीं शताब्दी के भारतीय मुसलमानों के ऐसे प्रथम नेता थे, जिन्होंने उनकी संस्कृति गिरावट पर तीव्र चिंता प्रकट की। वलीउल्लाह द्वारा सदा इस्लाम के प्रभुत्व को स्थापित करने की बात की जाती थी। वली उल्लाह ने इस बात पर बल दिया कि इस्लाम के प्रमुख न्याय शास्त्रों के बीच समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए, क्योंकि इसी के कारण भारतीय मुसलमान आपस में विभाजित है। उनकी मृत्यु के उपरांत अब्दुल अजीज इस विचारधारा के नेता बने। उनके द्वारा यहां घोषित किया गया कि भारत अब दारुल इस्लाम नहीं रहा। इस विचारधारा को आंदोलनकारी रूप संयुक्त प्रांत स्थित रायबरेली के सैयद अहमद ने दिया जो कि वली उल्लाह की विचारों से प्रभावित थे एवं उग्र स्वभाव के थे। ऐसा कहा जाता है कि उन्हें ' हाल ' आया करता था। जिसमें उन्हें यह दैवीय संदेश सुनाई देता था कि तुम इस्लाम की सेवा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दो। वे मात्र आध्यात्मिक साधना में डूबे रहने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे तारीक - ए - मोहम्मदिया को पुनः स्थापित कर पैगंबर के पद चिन्हों पर चलना चाहते थे। उन्होंने मुसलमानों के उत्थान के लिए तीन प्रमुख बातों पर बल दिया - कुरान शरीफ को धर्म राज्य के लिए सबसे ऊपर रखना, मजहब में कौल और अमल से अकीदा रखना एवं पवित्र जेहाद। साथ ही उनके द्वारा इस्लाम के पांच स्तंभों नमाज, अपने गुनाहों का एतराफ, खैरात, रोजा और हज में से हज पर सर्वाधिक बल दिया गया।