फरायजी आंदोलन

यह आंदोलन 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में पूर्वी बंगाल क्षेत्र में चलने वाला पुनरुत्थानवादी आंदोलन था। इस आंदोलन के नेता इस्लाम धर्म के मूल सिद्धांतों, जिन्हें फरेद कहा जाता है, पर बल देते थे। इस फरेद शब्द के आधार पर ही फराजी अथवा फरादी शब्द की उत्पत्ति हुई। इस आंदोलन को एक मुस्लिम नेता हाजी शरीयत उल्लाह ने नेतृत्व प्रदान किया। यह आंदोलन बंगाल के ढाका एवं फरीदपुर जिलों में मुख्य रूप से प्रारंभ हुआ। फरायाजियों का मानना था कि उनका देश अब दारुल हर्न हो चुका है, इसीलिए फरैजियों को ईद एवं जुम्मे की नमाज में पढ़ना स्थगित कर देना चाहिए। उन्होंने गांव से लेकर प्रांतीय  स्तर तक एक स्तरीकृत संगठनात्मक ढांचा विकसित किया एवं स्तारीकृत रूप से अपने खलीफा की नियुक्त की। जमींदारों द्वारा उत्पीड़न के कारण इस आंदोलन में राजनीतिक रंग भी सम्मिलित हो गया। यद्यपि यह मुख्यतः सामाजिक एवं सांस्कृतिक आंदोलन बना रहा। 1840 के उपरांत हाजी शरीयत उल्ला के पुत्र दादू किया ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया। दादू मिया एक क्रांतिकारी एवं सैन्यवादी  व्यक्ति था। उसने सशस्त्र बल का गठन किया एवं अन्य अवसरों पर पुलिस एवं जमींदारों के साथ संघर्ष किया। यह आंदोलन धीरे-धीरे अत्यंत लोकप्रिय हुआ। इस आंदोलन के नेताओं ने जमीदार ओं को अधिक कर देने से इंकार कर दिया एवं अपने हाजी दादू मियां के नेतृत्व में एकत्रित हुए। इनकी गतिविधियों पर नियंत्रण करने के लिए जमीदारों एवं नील फैक्ट्री के मालिक डनलप द्वारा पुलिस का सहारा लिया गया। इसके अंतर्गत दादा मियां के अनेक गांवों को लूट लिया गया। प्रतिशोध स्वरूप दादू मियां के अनुयायियों ने नील फैक्ट्री पर हमला करते हुए हिंसा प्रारंभ कर दी। अनेक जमींदारों को लूट लिया। परिणाम स्वरूप 1847 में पुलिस ने दादू मियां को गिरफ्तार कर लिया। अंततः 1862 में इस आंदोलन का तेज प्रायः समाप्त होने लगा। फराजी आंदोलन को दिल्ली के वालीउल्ला संप्रदाय के अनुयायियों एवं बंगाल के मुजाहिदो के नेता सैयद अहमद शाहिद का भी समर्थन प्राप्त था।
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