हरित क्रांति पर निबंध

हरित क्रांति एक उच्च गुणवत्ता वाले बीज, रासायनिक उर्वरक व नहरी सिंचाई आधारित कृषि उत्पादन की एक नवीन प्रक्रिया थी जिसके द्वारा भारतीय कृषि में गत्यात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया गया ।इसीलिए इसे बीज-उर्वरक-सिंचाई प्रोद्यौगिकी भी कहा जाता है । इसका श्रेय वैश्विक संदर्भ में अमरिकी नागरिक नॉर्मन अर्नेस्ट बोरलॉग तथा भारतीय सदंर्भ में एम.एस. स्वामीनाथन को दिया जाता है ।

इसकी निर्भरता के तीन प्रमुख कारक-

i. विज्ञान आधारित कृषि तकनीक ।

ii. सेवाओं का विशेष पैकेज ।

iii. सार्वजनिक नीति का विशेष पैकेज ।

कृषि की अनिश्चितता में कमी लाना, कृषि उत्पादन व उत्पादकता में वृद्धि करना एवं ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना हरित क्रांति के उद्देश्य थे और उसमें यह काफी हद तक सफल रहा हरित क्रांति के परिणामस्वरूप भारत कृषि में आत्मनिर्भर हो सका है एवं लोगों की खाद्य सुरक्षा उपलब्ध कराने के साथ-साथ औद्योगिक आवश्यकताओं की आपूर्ति व निर्यात कर सकने में भी समर्थ हुआ है । हरित क्रांति के कारण अंतरप्रादेशिक व अंतः प्रादेशिक विषमता उत्पन्न हुई है । उदाहरण के लिए, पंजाब व हरियाणा हरित क्रांति के परिणामस्वरूप विकसित क्षेत्रों में परिणम हो गए जबकि बिहार, ओडिशा जैसे राज्य पिछड़े रह गए । सिंचित व असिंचित क्षेत्रों की उत्पादकता में अंतर होने के कारण कृषकों के बीच तनाव बढ़ा है । साथ ही हरित क्रांति का मुख्य लाभ बड़े किसानों को ही मिल पाया है, छोटे किसान इससे वंचित रह गए हैं । सभी फसल इससे लाभान्वित नहीं हो सके । मुख्य लाभ गेहूँ व चावल की उत्पादकता को बढ़ाने के संदर्भ में ही मिला है । दलहन, तिलहन व नकदी फसलों की उत्पादकता को बढ़ाने के संदर्भ में पर्याप्त वृद्धि नहीं हुई

1987 के सूखे के प्रभाव और खाद्य पदार्थों के उत्पादन में कमी जैसे कारकों को ध्यान में रखकर सातवीं योजना का पुनर्मूल्यांकन किया गया और यह निर्णय लिया गया कि हरित क्रांति के दूसरे चरण की आवश्यकता है ।

इस कार्य के लिए 14 राज्यों के 169 जिलों को चुना गया है इनमें वे जिले चुने गए जहाँ पहले से ही सिंचाई की सुविधा उपलब्ध थी लेकिन कृषि विकास का गत्यात्मक प्रयास नहीं हुआ था ।169 जिलों में से 109 जिलों को चावल की खेती हेतु प्राथमिकता दी गई क्योंकि पूर्वी भारत तथा तटवर्ती भारत इसके लिए अनुकूल था ।आवश्यकता सिर्फ किसानों को जागरूक करने की थी । 

सिंचाई के लिए भूमिगत जल के प्रयोग पर बल ,संकर बीज व उर्वरकों के छोटे पैकेटों की उपलब्धता,कीटनाशकों पर उत्पाद कर की छूट  पर बल दिया गया।

किसानों पर राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष व प्रमुख कृषि वैज्ञानिक डॉ. एम.एस. स्वामीनाथन ने एक व्याख्यान में विचार व्यक्त किया कि-

‘हरित क्रांति की सफलता के बाद अब सदाबहार हरित क्रांति (Evergreen Revolution) की ओर बढ़ने की आवश्यकता है, ताकि देश के वर्तमान खाद्य उत्पादन 210 मीट्रिक टन से 420 मीट्रिक टन किया जा सके ।’

डॉ.एम.एस. स्वामीनाथन ने फसलोपरांत तकनीकी, कृषि प्रसंस्करण और विपणन के क्षेत्रों में न्यूनतम 60,000 ‘प्रयोगशाला से खेत तक’ (Lab to Land) प्रदर्शन कार्यक्रमों के आवश्यकता पर बल दिया है, ताकि पोषणीय कृषि व ग्रामीण विकास के साथ-साथ बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न वृद्धि को प्रोत्साहन मिले, साथ ही उद्योगों के लिए कृषिगत कच्चा माल भी निरंतर उपलब्ध हो सके ,इसमें कृषि जलवायु प्रदेश को ध्यान में रखते हुए विभिन्न क्षेत्रों में कृषि विकास व कृषि विविधीकरण लाने पर बल दिया गया है, ताकि देश की वर्तमान आवश्यकताओं की पूर्ति की जा सके ।

Posted on by