संविधान का अनुच्छेद 368 संसद को संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान करता है, किंतु अनुच्छेद 13 (2) में कहा गया है कि राज्य ऐसी कोई विधि नहीं बनाएगा जो भाग 3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को छीनती या न्यून करती है, अर्थात संसद मूल अधिकारों को समाप्त करने या कम करने वाली 'विधि' नहीं बना सकती है। अब प्रश्न है कि क्या संसद संविधान संशोधन द्वारा मूल अधिकारों को समाप्त या कम (संशोधित) कर सकती है या नहीं इसका उत्तर अनुच्छेद 13 (2) में प्रयुक्त 'विधि' शब्द के अर्थ पर निर्भर करता है यदि अनुच्छेद 13 (2) में प्रयुक्त विधि शब्द के अंतर्गत संविधान संशोधन विधि आती है तो संसद को मूल अधिकारों में संशोधन की शक्ति नहीं होगी और यदि नहीं आती है तो होगी। अनुच्छेद 13 (2) में प्रयुक्त 'विधि' शब्द का अर्थ एक लंबे समय तक विवाद का विषय रहा है जिसके प्रमुख तत्व नीचे दिए गए हैं। जैसे-
शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951 S.C):-
सर्वप्रथम इस वाद में, प्रथम संविधान संशोधन अधिनियम 1951 को, जिसके द्वारा भूमि सुधार विधियों को संरक्षित किया गया था, इस आधार पर चुनौती दी गई कि वह भाग 3 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों का अतिक्रमण करता है। वादियों का तर्क था कि संविधान संशोधन विधि अनुच्छेद 13 (2) में प्रयुक्त 'विधि' शब्द के अंतर्गत आती है, अतः संसद संविधान संशोधन द्वारा भी मूल अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती है। परंतु उच्चतम ने उक्त तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि, अनुच्छेद 368 में मूल अधिकारों सहित संविधान के किसी भी भाग में संशोधन शक्ति संसद में निहित है, तथा अनुच्छेद 13 (2) में प्रयुक्त विधि शब्द के अंतर्गत केवल सामान्य विधियां शक्ति के प्रयोग में बनाई गई विधि आती हैं, संविधायी शक्ति के प्रयोग द्वारा किए गए 'संविधान संशोधन विधि' नहीं।