सर्वोच्च विधान परिषद तथा प्रांतीय विधान परिषद की सदस्य संख्या में वृद्धि ,गवर्नर जनरल की कार्यकारिणी परिषद में एक भारतीय सदस्य की नियुक्ति।
इस अधिनियम के द्वारा भारत मे पहली बार अप्रत्यक्ष एवं सीमित ही सही ,निर्वाचन सिद्दांत को मान्यता मिली।
मुसलमानों को उनकी साम्राज्य की सेवा एवं व्यवहारिक महत्त्व को देखते हुए पृथक एवं प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व दिया गया।
बजट पर विचार करने एवं उस पर प्रस्ताव करने का अधिकार मिला।पूरक प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया।
सार्वजनिक मामलो पर प्रस्ताव प्रस्तुत करने का अधिकार दिया गया।
केंद्रीय एवं प्रांतीय विधायी शक्तियों को बढ़ाया गया।
इस अधिनियम के द्वारा स्थापित चुनाव प्रणाली बहुत ही अस्पष्ट तथा जन प्रतिनिधित्व के विरुद्ध थी।
इस अधिनियम के माध्यम से सुधारवादियों को संतुष्ट करने का प्रयास किया गया।लेकिन अंग्रेजों की इस चाल को भारतीयों ने बहुत जल्द ही समझ लिया।इस अधिनियम के द्वारा हिन्दू और मुसलमानों को अलग करने का खूनी खेल खेला गया जिसके परिणाम स्वरूप 1947 में भारत का विभाजन दो भागों में हुआ।