तुलुव वंश

तुलुव वंश

      तुलुव वंश की स्थापना वीर नरसिंह ने 1505 ई0 की थी।

      तुलुव वंश का महान शासक कृष्णदेव राय था। उसने आन्ध्र भोज, अवनिभोज, आन्ध्रपितामह, विष्णुचित की उपाधि धारण की।  

      कृष्णदेव राय के दरबार में तेलगू साहित्य के आठ सर्वश्रेष्ठ कवि रहते थे जिन्हे अष्ट दिग्गज कहा जाता था।

      कृष्णदेव राय ने तेलगू में अमुक्तमाल्यद (मोतियों की माला) एवं संस्कृत में जाम्बवती कल्याणम् की रचना की। अमुक्तमाल्यद तेलगू भाषा में लिखा है। 

      कृष्णदेव राय ने नागलापुर नये नगर एवं हजारा तथा विट्ठल स्वामी मन्दिर का निर्माण करवाया। वह शतरंज प्रेमी था।

      राक्षस-तंगडी या तालीकोटा या वन्नी हट्टी का युद्व 23 जनवरी 1565 ई0में हुआ जिसमें विजय नगर का पतन हुआ।

      इस युद्ध में विजय नगर के विरूद्ध अहमदनगर, बीजापुर, गोलकुण्डा, तथा बीदर, शामिल थे।

      बरार इस युद्ध में सम्मिलित नही हुआ था।

      तालीकोटा के युद्व में विजय नगर का नेतृत्व रामराय कर रहा था।

      विजय नगर के चैथे राजवंश अरावीड वंश 1570-1650ई0 की स्थापना तिरूमल ने किया था।

      विजय नगर में भूराजस्व की दर कृषि उपज का 1/6 भाग था। भूमिकर को शिष्ट कहा जाता था।

      विजयनगर सम्राज्य को प्रशासन को क्रमशः निम्न भागों में विभाजित था। राज्य मण्डलम-कोट्टम या वलनाडु (जिले)-नाडु (परगना)-मेलाग्राम-उग्र या ग्राम।

      विवाह कर वर एवं वधू दोनो से ही लिया जाता था।

      विधवा से विवाह करने वाले इस कर से मुक्त थे।

      उंवलि-ग्राम में विशेष सेवाओं के बदले लगान मुक्त भूमि।

      कुदि-कृषक मजदूर थे।

      बेसबग्ग-मनुष्यो के क्रय विक्रय को कहा जाता था।

      मन्दिरों मे रहने वाली स्त्रियों को देवदासी कहा जाता था।

      विजय नगर का सैन्य विभाग कदाचार कहलाता था।

      विजयनगर का सर्वत्र प्रसिद्ध सिक्का बराह था। प्रताप तथा फणम छोटे स्वर्ण सिक्के थे। चाँदी का सिक्का तार था।

      विजय नगर साम्राज्य का प्रमुख बन्दरगाह कालीकट था।

      विजय नगर राज्य मंे सेना को मुख्यतः नगद वेतन दिया जाता था।

      विजयनगर साम्राज्य में नन्दी नागरी लिपि का प्रयोग होता था।

      सूफी संत बाबा फरीद की सबसे महत्वपूर्ण योगदान रचनाओं से है जो सिक्खो के पवित्र ग्रन्थ  गुरू ग्रन्थ साहिब में संकलित है।

      निजामुद्दीन औलिया ने अपने जीवन काल में सर्वाधिक दिल्ली के सात सुल्तानों का शासन काल देखा था।

      प्रसिद्ध विद्वान अमीर खुसरांे सूफी सन्त निजाम उद्दीन औलिया के शिष्य थे।

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