महात्मा गांधी ने सन् 1909 में इंग्लैंड से वापस दक्षिण अफ्रीका लौटने के दौरान 'किल्जेनन कैसल' नामक जहाज पर 'हिंद स्वराज'' नामक पुस्तक की रचना की थी जो सबसे पहले 'इंडियन ओपनीयन' दिसंबर 2009 के दो अंकों में 'इंडियन होम रूल' नाम से प्रकाशित हुई थी। मूलत: गुजराती में लिखी गई इस पुस्तक में 20 अध्याय हैं, जिसका प्रकाशन 1910 में हुआ। गांधीजी भारत में ब्रिटिश अफसरों द्वारा किये गये अपमान का बदला लेने के लिए मदन लाल ढींगरा द्वारा ब्रिटिश अधिकारी कर्जन वाइली की हत्या की घटना की सूचना पाकर विचलित हो उठे थे। उन्हें इस बात से तब और अधिक चिंता होने लगी थी कि इस घटना को भारत के अधिसंख्य युवाओं का समर्थन है। यही नहीं, अपने इंग्लैंड प्रवास के दिनों में कुछ ऐसे दलों के नेताओं से उनकी मुलाकात हुई जो स्वतंत्रता पाने के लिए अंग्रेजाें की हत्या करना भी उचित ठहराते थे। गांधीजी को उन्हें समझाने के प्रयास में सफलता नहीं मिल पायीं। तब उन्होंने इन सारी स्थितियों के बारे में चिंतन-मनन किया और फिर वहां से दक्षिण अफ्रीका की वापसी यात्रा में 'हिंद स्वराज' की रचना की। गांधीजी ने इस पुस्तक में यह समझाने का प्रयास किया कि स्वराज्य तभी प्राप्त हो सकता है जब भारत की महान सभ्यता का भारतीय अनुसरण करें तथा स्वंय को आधुनिक सभ्यता के विनाशकारी प्रभावों से बचा कर रख सकें। उनका यह स्पष्ट मानना था कि हिंसा को भारतीय सभ्यता में कोई स्थान नहीं है। 'हिंद स्वराज्य' में गांधीजी ने स्वराज्य में शिक्षा के महत्व पर चर्चा की है। वे भारत में दी जा रही उच्च शिक्षा को इसलिए महत्वहीन मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि वह छात्रों को जीवनगत मूल्यों की शिक्षा नहीं देती। पुस्तक के 20 अध्यायों में से 11वें अध्याय तक ऐतिहासिक संदर्भों पर विचार किया गया है लेकिन बाद के नौ अध्यायों में स्वराज्य को परिभाषित करते हुए सभ्यता के स्वरूप पर चर्चा करने के साथ धर्म के अभिप्राय को समझाते हुए वास्तविक होमरूल के लिए स्वशासन की आवश्यकता के महत्व को रेखांकित किया गया है।
गांधीजी के अनुसार : स्वराज एक पवित्र शब्द है ; यह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्मशासन और आत्म संयम है, अंग्रेजी शब्द इंडिपेंडेंस अक्सर सब प्रकार की मर्यादाओं से मुक्त निरंकुश आजादी का या स्वच्छंदता का अर्थ देता है। वह अर्थ स्वराज्य में नहीं है।