मूल अधिकार में संशोधन// सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965)/ गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य(1967) ।

सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965):-

वाद में मूल अधिकारों में संशोधन का प्रश्न पुनः उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारार्थ आया। इसमें 17वें संविधान संशोधन अधिनियम 1964 को चुनौती दी गई थी। न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को पुष्टि किया, और कहा कि यदि संविधान निर्माता गण मूल अधिकारों को संशोधन से परे रखना चाहते, तो निश्चित ही उन्होंने इस बारे में संविधान में स्पष्ट उपबंध किया होता ।

गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967)

इस वाद में उच्चतम न्यायालय की 11 सदस्यीय पीठ (मुख्य न्यायाधीश श्री सुब्बाराव) ने 6:5 के बहुमत से शंकरी प्रसाद तथा सज्जन सिंह के विनिश्चयों को पलटते हुए, यह धारित किया कि अनुच्छेद 368 के तहत संसद को भाग 3 में संशोधन करने की कोई शक्ति प्राप्त नहीं है । अनुच्छेद 368 में केवल संविधान संशोधन की प्रक्रिया का प्रावधान है संविधान संशोधन की शक्ति का नहीं। संविधान संशोधन की शक्ति अनुच्छेद 245, 246 तथा 248 में निहित है। न्यायालय ने यह भी कहा कि संविधान संशोधन एक विधायी प्रक्रिया है, अतः विधि' शब्द के अंतर्गत सभी प्रकार की विधियां आती हैं, चाहे वह साधारण विधि हो या संविधान संशोधन विधि। इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह घोषित किया कि मूल अधिकारों में संशोधन हेतु संविधान सभा आहूत की जानी चाहिए, यद्यपि अल्पमत के अनुसार शंकरी प्रसाद तथा सज्जन सिंह के मामले में दिया गया निर्णय सही था तथा 'विधि' शब्द के अंतर्गत सिर्फ साधारण विधि आती है संविधान संशोधन विधि नहीं। उल्लेखनीय है कि यह निर्णय भविष्यलक्षी प्रभाव में लागू किया गया था। अतः इसके पूर्व (भूतकाल में) दिए गए संविधान संशोधन विधिमान्य बने रहे।

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