मजबूरी ना हो, तो वहां जाना ही कौन चाहता है। दुनिया के कई अस्पताल सुविधाएं बढ़ाते हुए फाइव स्टार होटलों की तरह बन गए हैं, लेकिन मरीजों को वह भी संतुष्ट नहीं कर पाते। मरीजों को अस्पताल में जो चीज सबसे ज्यादा परेशान करती है वह है अस्पताल का खाना। अगर आप अपने देश के सरकारी अस्पतालों में मिलने वाली पतली दाल बेस्वाद खिचड़ी और बदरंग दलीय से उबे हुए हैं तो दुनिया भर के अस्पतालों से आई रिपोर्टों पर नजर डाले, वहां भी लगभग यही हाल है।
कहीं-कहीं तो इससे भी बुरा है और सबसे बड़ी बात यह है कि मरीजों को खाना कहीं भी स्वास्थ्यवर्धक नहीं है।कनाडा के अस्पतालों के भोजन का एक सर्वे बताता है कि वहां भोजन तैयार करने की प्रक्रिया में स्वास्थ्य का ध्यान ज्यादातर तदर्थ तौर पर रखा जाता है या खामी 45 परसेंट मामलों में पाई गई। अमेरिका में जनरल आफ मेडिकल एसोसिएशन ने अपने कई अध्ययनों में यही नतीजा निकाला है की सबसे बड़ी बात यह है कि अक्सर खाने पीने की चीजों को प्लास्टिक के ऐसे प्लेट और कप आदि में परोसा जाता है जिन्हें सेहत के लिए अच्छा नहीं माना जाता है जहां नहीं भी परोसा जाता है वहां भी जूस वगैरह का भंडारण प्लास्टिक के कंटेनरो में ही होता है। एक अमेरिकी संगठन में अस्पतालों में मरीज के बीमार दारू और उन्हें देखने वालों के लिए बनी का सर्वे किया तो पाया कि ज्यादातर जगहों पर ऐसा फास्ट फूड ही मिल रहा था।
जिसे सेहत के लिए हानिकारक या खतरनाक माना जाता है इसे हम भारतीय अस्पतालों और उसके आसपास की जगहों पर देख सकते हैं वैसे मरीज के भोजन का मामला कभी सरल नहीं रहा उनकी सेहत का ख्याल रख कर जो सादा खाना तैयार किया जाता है। आमतौर पर उन्हें पसंद नहीं आता शायद इसलिए भी स्वास्थ्य कर खाने का स्वाद हमारी जबान पर कुछ ज्यादा ही चढ़ चुका है इसलिए कई बार अगर भोजन सादा हो तो उससे मरीजों का खाना कह दिया जाता है खाना स्वास्थ्यवर्धक भी हो मरीज के लिए मददगार भी हो और उसे पसंद भी आए ऐसे व्यंजन तैयार करना आज भी बावरियों के लिए एक चुनौती बना हुआ है।लेकिन स्वास्थ्य कर खाने की समस्या इससे अलग है हम भले ही अमानत मानते हो कि खाने की हमारी सेहत में बड़ी भूमिका होती है लेकिन सच यही है कि अस्पताल की प्राथमिकता मरीज का इलाज होती है। उसका खाना नहीं इसलिए जितना निवेश इलाज और उसकी सुविधाओं पर किया जाता है उतना निवेश अस्पताल की रसोई में नहीं होता है