आंध्र सातवाहन वंश का अंतिम शासक यज्ञ श्री सातकर्णी इस वंश का अंतिम महान शासक था इस काल में ताबे तथा का से के अलावा शीशे के सिक्के काफी प्रचलित थे। सातवाहन शासक खुद को ब्राम्हण कहते थे सातवाहन काल में मुख्य रूप से दो धार्मिक भवनों का निर्माण काफी संख्या में हुआ चैत्य अर्थात बौद्ध मंदिर तथा बिहार अर्थात बौद्ध भिक्षुओं का निवास स्थान महाराष्ट्र स्थित कार्ले का चैत्य इन में महत्वपूर्ण है अशोक के काल के अनुरूप इस समय में भी जिलों को आहार कहा जाता था और इनमें अधिकारी अमात्य और महामात्य कहलाते थे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशासन का काम गोल्मिक को सौंपा जाता था गौल्मिक एक सैनिक की टुकड़ी का प्रधान होता था जिसमें नव रथ नव हाथी 25 घोड़े और 45 पैदल सैनिक होते थे सातवाहन शासकों ने ब्राह्मणों तथा बौद्ध भिक्षुओं को कर रहित गांव देने की प्रथा की शुरुआत की इस काल की आधिकारिक भाषा प्राकृतिक तथा लिपि ब्राह्मी थी प्रसिद्ध प्राकृत ग्रंथ गाथासप्तसती इसी काल में लिखी गई इस काल के दरबार में ही गुणढ्य निवास करते थे जिन्होंने व्रत कथा का रचना की थी।
तीसरी सदी तक सातवाहन साम्राज्य का अंत हो गया तथा उत्तरी महाराष्ट्र क्षेत्र में का वाकाटक राज्य स्थापित हो गया आंध्र प्रदेश के इक्ष्वाकुओ ने तथा दक्षिणी पूर्वी क्षेत्र में पल्लवों ने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिया।
चेदि वंश कलिंग का चेदि वंश से संबंधित जानकारी का स्रोत इस वंश के राजा शासक खारवेल का हाथी गुफा अभिलेख है खारवेल मगध के सासक बृहस्पतिमित्र के विरुद्ध अभियान का भगवान जिन की मूर्ति भी मदद से लाने में सफल हुआ जिनको तीन शताब्दी पूर्व मगध के सासक महापदम नंद द्वारा कलिंग से ले जाया गया था जैन लोगों को ग्राम दान दिए जाने का प्रथम उल्लेख हाथी गुफा अभिलेख से प्राप्त होता है